दिल्ली के जंतर-मंतर से जुड़े मामले में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत 19 अक्टूबर को दो दिन के लिए और बढ़ाकर 21 अक्टूबर तक कर दी गई। स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) ने यह फैसला कथित तौर पर पहले दिए गए शांति बॉन्ड के उल्लंघन, दोबारा शांति भंग होने की आशंका और पेश किए गए जमानतदारों को अनुपयुक्त पाए जाने के आधार पर लिया। दोनों ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
मामले की कानूनी पेचीदगी यह है कि यह सिर्फ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के आरोप तक सीमित नहीं है। कार्यवाही में BNSS की धारा 126 के तहत शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड की प्रक्रिया, उसके कथित उल्लंघन और बाद की हिरासत का सवाल भी जुड़ा है। वहीं, बचाव पक्ष का कहना है कि हिरासत बढ़ाने और जमानतदारों को खारिज करने के आदेश में कानूनी आधार पर्याप्त नहीं है।
पहले समझिए, मामला शुरू कैसे हुआ
दिल्ली पुलिस के अनुसार, 13 अक्टूबर को सौरव दास और आशुतोष रांका जंतर-मंतर के उस हिस्से में पहुंचे जिसे प्रदर्शन स्थल के तौर पर अधिसूचित नहीं किया गया था। रिपोर्टों के मुताबिक दोनों ने बैरिकेड वाले प्रवेश को पार कर वहां पहुंचकर प्रदर्शन किया। इसके बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया।
14 अक्टूबर को दोनों को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इसके बाद 19 अक्टूबर को पांच दिन की अवधि पूरी होने पर उन्हें दोबारा SEM के सामने पेश किया गया। इसी सुनवाई में हिरासत 21 अक्टूबर तक बढ़ाई गई।
हिरासत बढ़ाने के पीछे अदालत की मुख्य दलील क्या थी?
19 अक्टूबर के आदेश में SEM ने मुख्य रूप से इस बात पर विचार किया कि दोनों के खिलाफ भविष्य में फिर से शांति भंग होने की आशंका है या नहीं।
अदालत के सामने यह भी रिकॉर्ड पर था कि दोनों ने 11 अक्टूबर को शांति बनाए रखने से संबंधित बॉन्ड दिए थे। SEM के अनुसार, इसके बाद जंतर-मंतर से जुड़ी घटना को उस बॉन्ड के उल्लंघन के रूप में देखा गया। अदालत ने यह भी कहा कि भविष्य में कथित आचरण दोबारा नहीं दोहराने का आश्वासन उपलब्ध सामग्री और पिछले आचरण को देखते हुए पर्याप्त भरोसा पैदा नहीं करता।
यहां एक अहम कानूनी फर्क समझना जरूरी है। यह प्रक्रिया किसी व्यक्ति को किसी अपराध में दोषी ठहराने वाली सुनवाई नहीं है। BNSS की धारा 126 का उद्देश्य ऐसे मामलों में शांति बनाए रखने के लिए सुरक्षा बॉन्ड की मांग करना है, जहां कार्यकारी मजिस्ट्रेट को शांति भंग या सार्वजनिक शांति प्रभावित होने की आशंका हो।
जमानतदारों का मामला क्यों महत्वपूर्ण हो गया?
हिरासत बढ़ने का दूसरा अहम कारण जमानतदारों से जुड़ा विवाद है।
19 अक्टूबर की कार्यवाही में पेश किए गए जमानतदारों की जांच के दौरान मजिस्ट्रेट ने कथित तौर पर दस्तावेजों और पहचान से संबंधित समस्याएं पाईं। एक जमानतदार के बॉन्ड पर लगी तस्वीर और आधार कार्ड की तस्वीर में कथित तौर पर अंतर पाया गया। दूसरे जमानतदार के बारे में आदेश में कहा गया कि वह सौरव दास की बुनियादी जानकारी, जैसे उनके माता-पिता और पते से जुड़ी जानकारी, ठीक से नहीं बता सका।
मजिस्ट्रेट ने इस आधार पर दोनों जमानतदारों को अनुपयुक्त माना और नए जमानतदार पेश करने को कहा। आदेश में यह भी दर्ज है कि जमानतदार का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि संबंधित व्यक्ति जरूरत पड़ने पर अदालत के सामने पेश हो।
यही बिंदु इस मामले में व्यावहारिक तौर पर महत्वपूर्ण है। अगर अदालत किसी जमानतदार को स्वीकार नहीं करती, तो व्यक्ति की रिहाई सिर्फ इस वजह से अटक सकती है कि वैध और स्वीकार्य surety उपलब्ध नहीं हुई।
BNSS की धारा 126 का यहां क्या मतलब है?
BNSS की धारा 126 उन परिस्थितियों से संबंधित है, जहां कार्यकारी मजिस्ट्रेट को लगता है कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है या सार्वजनिक शांति को प्रभावित कर सकता है। ऐसी स्थिति में मजिस्ट्रेट संबंधित व्यक्ति से यह बताने को कह सकता है कि उससे शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड क्यों न लिया जाए। इसकी अवधि अधिकतम एक साल तक हो सकती है।
रांका और दास के मामले में इसी तरह की preventive proceedings और पहले दिए गए बॉन्ड का कथित उल्लंघन हिरासत बढ़ाने की कार्यवाही का आधार बना है। इसलिए इसे सीधे किसी नियमित आपराधिक मुकदमे में जमानत की तरह देखना पूरी तरह सही नहीं होगा।
कानूनी विवाद का एक अहम हिस्सा यही है कि क्या उपलब्ध सामग्री के आधार पर भविष्य में शांति भंग की आशंका इतनी मजबूत थी कि हिरासत जारी रखी जाए, और क्या बॉन्ड तथा surety से जुड़ी प्रक्रिया कानून के मुताबिक अपनाई गई।
बचाव पक्ष का क्या कहना है?
बचाव पक्ष ने अदालत में दोनों की तत्काल रिहाई की मांग की। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, वकीलों ने दलील दी कि दोनों भविष्य में कथित गतिविधि दोबारा नहीं दोहराएंगे। यह भी कहा गया कि 10 अक्टूबर के बाद दोनों ने किसी नए प्रदर्शन का आह्वान नहीं किया था और वे अलग-अलग जंतर-मंतर पहुंचे थे।
बचाव पक्ष ने बाद में SEM के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए यह तर्क दिया कि हिरासत बढ़ाने और surety खारिज करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं था। याचिका में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का भी सवाल उठाया गया है।
अब हाईकोर्ट में क्या दांव पर है?
20 अक्टूबर को रांका और दास ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। उनकी कानूनी टीम ने मामले की तत्काल सुनवाई की मांग की थी। हालांकि, 20 अक्टूबर की रात उनकी याचिका की तत्काल सुनवाई नहीं हो सकी और टीम ने 21 अक्टूबर को सुनवाई की कोशिश जारी रखने की बात कही।
इसका मतलब है कि मामला अब दो स्तरों पर चल रहा है—
- SEM स्तर पर: शांति बॉन्ड, कथित उल्लंघन और हिरासत से जुड़ी कार्यवाही।
- दिल्ली हाईकोर्ट में: SEM के हिरासत बढ़ाने वाले आदेश को चुनौती और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल।
इस बीच दिल्ली पुलिस ने मामले से जुड़ी एक अन्य FIR को क्राइम ब्रांच को सौंप दिया है। 21 अक्टूबर की सुबह तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, दोनों नेता न्यायिक हिरासत में हैं और मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।
आगे क्या होगा?
21 अक्टूबर की कार्यवाही इस मामले में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव है। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह रहेगा कि रांका और दास की हिरासत जारी रखने के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं और उनके खिलाफ पेश किए गए sureties को लेकर उठाई गई आपत्तियों का क्या प्रभाव पड़ता है।
इसके साथ हाईकोर्ट में दायर चुनौती भी महत्वपूर्ण है। अगर हाईकोर्ट SEM के आदेश में कानूनी कमी पाता है, तो हिरासत के खिलाफ राहत मिल सकती है। दूसरी तरफ, यदि निचली कार्यवाही को उचित माना जाता है, तो मामले की preventive proceedings और उससे जुड़ी शर्तें आगे भी जारी रह सकती हैं।
फिलहाल उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि दोनों दोषी हैं। उनके खिलाफ लगाए गए आरोप और पुलिस की दलीलें न्यायिक निष्कर्ष के बराबर नहीं हैं। मामले में आगे की अदालत की कार्यवाही ही तय करेगी कि हिरासत और बॉन्ड से जुड़े कानूनी विवाद का अंतिम रास्ता क्या होगा।
स्थिति: 21 अक्टूबर 2026 को उपलब्ध जानकारी के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई है। मामले की सुनवाई और दिल्ली पुलिस की जांच जारी है; इसलिए आगे के न्यायिक आदेश इस स्थिति को बदल सकते हैं।