नई दिल्ली, 21 अक्टूबर 2026। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले दक्षिण भारत के कुछ प्रमुख क्षेत्रीय नेता अपने राजनीतिक संपर्कों और राष्ट्रीय गठबंधनों को लेकर नए विकल्प तलाशते दिखाई दे रहे हैं। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेलुगु देशम पार्टी (TDP) प्रमुख एन. चंद्रबाबू नायडू की तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से मुलाकात, वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) प्रमुख वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी का चुनाव आयोग के मुद्दे पर बदला रुख और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका को लेकर चर्चाएं इसी संदर्भ में देखी जा रही हैं। हालांकि, इन गतिविधियों को 2029 के लिए किसी नए औपचारिक गठबंधन का संकेत मानना अभी जल्दबाजी होगी।
अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस ने 21 अक्टूबर को प्रकाशित अपनी राजनीतिक पड़ताल में दक्षिण भारत के नेताओं की इन गतिविधियों को 2029 की संभावित राजनीतिक स्थितियों से जोड़कर देखा है। वहीं, द इकोनॉमिक टाइम्स ने 16 अक्टूबर की रिपोर्ट में नायडू की दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक पहुंच और जगन के बदले राजनीतिक रुख का विवरण दिया है। इन रिपोर्टों से फिलहाल गठबंधन के विकल्प खुले रखने और क्षेत्रीय मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने की कोशिशों के संकेत मिलते हैं।
नायडू की पहल: एनडीए के साथ रहते हुए दक्षिणी राज्यों से संपर्क
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में शामिल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के प्रमुख सहयोगियों में हैं। उनकी पार्टी TDP का केंद्र में समर्थन राष्ट्रीय राजनीति में उसे अहम स्थान देता है। इसके बावजूद नायडू दक्षिण भारत के उन नेताओं से भी संपर्क बढ़ा रहे हैं जो दूसरे राजनीतिक खेमों से जुड़े हैं।
द इकोनॉमिक टाइम्स की 16 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, विजयवाड़ा उत्सव के दूसरे संस्करण को नायडू ने दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से संवाद बढ़ाने के अवसर के रूप में इस्तेमाल किया। इस पहल में पानी के बंटवारे, राज्यों के बीच सहयोग और गोदावरी-कावेरी नदी जोड़ने जैसी परियोजनाओं पर चर्चा शामिल रही।
रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने नायडू से मुलाकात की। दोनों राज्यों के बीच चेन्नई को कृष्णा नदी से पानी की आपूर्ति और प्रस्तावित गोदावरी-कावेरी नदी जोड़ो परियोजना जैसे विषय चर्चा में आए।
इस संपर्क का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि नायडू केंद्र में भाजपा के सहयोगी हैं, जबकि तमिलनाडु की राजनीति में अलग-अलग दलों के बीच राष्ट्रीय गठबंधन को लेकर प्रतिस्पर्धा बनी हुई है।
हालांकि, राज्यों के साझा मुद्दों पर बातचीत अपने आप में चुनावी गठबंधन का प्रमाण नहीं है। नायडू की इस पहल से फिलहाल अंतरराज्यीय सहयोग और क्षेत्रीय नेतृत्व के स्तर पर संवाद बढ़ाने की कोशिश स्पष्ट होती है।
जगन मोहन रेड्डी का बदला रुख, INDIA गठबंधन पर नजर
आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और YSRCP प्रमुख जगन मोहन रेड्डी की राजनीतिक स्थिति भी चर्चा में है। उनकी पार्टी ने पहले संसद में केंद्र सरकार के कई महत्वपूर्ण विधायी कदमों का समर्थन किया था, हालांकि वह औपचारिक रूप से NDA में शामिल नहीं हुई थी।
द इकोनॉमिक टाइम्स की 16 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, जगन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे युवाओं के प्रदर्शन का समर्थन किया। रिपोर्ट में इसे चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर उनके रुख में बदलाव के रूप में देखा गया है।
जगन ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून पर भी अपने पुराने समर्थन को लेकर सवाल उठाए हैं। इस कानून के तहत चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता की समिति का प्रावधान है।
इस घटनाक्रम के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDIA गठबंधन के साथ YSRCP के संभावित नजदीकी संबंधों को लेकर अटकलें तेज हुई हैं। रिपोर्ट में कांग्रेस नेताओं से संभावित संपर्कों और वाम दलों के साथ जगन की गतिविधियों का भी उल्लेख है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है। YSRCP के औपचारिक रूप से INDIA गठबंधन में शामिल होने की घोषणा सामने नहीं आई है। द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी ने कांग्रेस के साथ नजदीकी बढ़ने से जुड़ी कुछ चर्चाओं को अफवाह बताया था। इसलिए जगन के रुख में बदलाव को संभावित राजनीतिक पुनर्समायोजन के संकेत के तौर पर देखना अधिक उचित होगा, न कि गठबंधन बदलने के अंतिम फैसले के रूप में।
विजय की राजनीति: तमिलनाडु से राष्ट्रीय विकल्पों तक
तमिलनाडु में विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) की स्थिति भी 2029 की राजनीतिक चर्चा का हिस्सा है। विजय अब केवल फिल्मी पृष्ठभूमि वाले राजनीतिक नेता नहीं हैं; 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद उनकी पार्टी राज्य की सत्ता में पहुंच चुकी है।
विजय की राजनीतिक रणनीति के सामने दो स्तरों पर चुनौती है। पहला, तमिलनाडु में सरकार चलाते हुए अपने चुनावी वादों को पूरा करना। दूसरा, राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी की भूमिका और अन्य दलों के साथ उसके संबंधों को स्पष्ट करना।
इंडिया टुडे ने 5 सितंबर 2026 की रिपोर्ट में TVK के भीतर विजय को 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए विपक्ष के प्रधानमंत्री पद के संभावित चेहरे के रूप में पेश किए जाने की मांग और कांग्रेस के साथ इससे जुड़े मतभेदों का उल्लेख किया था। रिपोर्ट के अनुसार, इस मुद्दे पर सहयोगी दलों के बीच बातचीत की तैयारी भी थी।
इसके बाद नायडू से विजय की मुलाकात ने राजनीतिक चर्चाओं को और बढ़ाया है। लेकिन दोनों नेताओं के बीच मुलाकात को किसी चुनावी समझौते का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उपलब्ध रिपोर्ट में मुख्य रूप से अंतरराज्यीय मुद्दों और राजनीतिक संपर्कों का उल्लेख है।
विजय के लिए यह भी अहम होगा कि उनकी पार्टी राज्य में शासन के अपने प्रदर्शन के आधार पर राजनीतिक विश्वसनीयता मजबूत करे। राष्ट्रीय स्तर पर किसी गठबंधन में उसकी भूमिका इस बात पर निर्भर कर सकती है कि वह राज्य के सहयोगियों और दूसरे विपक्षी दलों के साथ अपने संबंध किस तरह विकसित करती है।
स्टालिन और DMK के सामने गठबंधन की चुनौती
तमिलनाडु की राजनीति में मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और DMK की भूमिका भी राष्ट्रीय विपक्ष के समीकरणों के लिए महत्वपूर्ण है। DMK लंबे समय से राज्य की राजनीति में प्रमुख ताकत रही है और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के साथ उसके संबंधों का असर विपक्षी गठबंधन की रणनीति पर पड़ता है।
हालिया राजनीतिक बहस में चुनाव आयोग, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और राज्यों के अधिकार जैसे मुद्दे शामिल हैं। 17 अक्टूबर को प्रकाशित टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, स्टालिन ने SIR के मुद्दे पर चुनाव आयोग के साथ कांग्रेस की भूमिका की भी आलोचना की थी। इससे विपक्षी दलों के बीच मुद्दों और रणनीति को लेकर मतभेद सामने आए।
फिर भी, कांग्रेस और DMK के संबंधों में किसी स्थायी टूट या नए गठबंधन की औपचारिक घोषणा की पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं होती। किसी मुद्दे पर सार्वजनिक असहमति को गठबंधन समाप्त होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
DMK के सामने चुनौती राज्य में अपनी राजनीतिक स्थिति बनाए रखने के साथ राष्ट्रीय विपक्ष के भीतर अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने की है। दूसरी ओर, कांग्रेस को क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ तालमेल और राष्ट्रीय नेतृत्व के सवालों के बीच संतुलन बनाना होगा।
2029 से पहले क्या बदल सकता है?
दक्षिण भारत की इन राजनीतिक गतिविधियों से तीन व्यापक रुझान सामने आते हैं।
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क्षेत्रीय मुद्दों पर सहयोग: नायडू की पहल बताती है कि पानी, बुनियादी ढांचे और राज्यों के आर्थिक हित जैसे विषय अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं को बातचीत के लिए साथ ला सकते हैं।
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राष्ट्रीय गठबंधन के विकल्प: जगन मोहन रेड्डी के रुख में बदलाव और विजय की राष्ट्रीय भूमिका को लेकर उठती चर्चाएं दिखाती हैं कि कुछ दल 2029 से पहले अपनी संभावनाओं का आकलन कर सकते हैं।
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विपक्षी दलों के बीच तालमेल: DMK, कांग्रेस और दूसरे क्षेत्रीय दलों के बीच संबंध इस बात को प्रभावित कर सकते हैं कि लोकसभा चुनाव में विपक्ष किस तरह सीटों, नेतृत्व और साझा मुद्दों पर सहमति बनाता है।
इन संकेतों को अभी किसी एक नए दक्षिण भारतीय मोर्चे के गठन के रूप में देखना सही नहीं होगा। नायडू केंद्र में NDA के सहयोगी बने हुए हैं, जबकि जगन की ओर से INDIA गठबंधन में औपचारिक प्रवेश की पुष्टि नहीं हुई है। विजय और स्टालिन की राजनीति के बीच भी कई ऐसे राज्य-स्तरीय मुद्दे हैं जिनका असर राष्ट्रीय समीकरणों से अलग हो सकता है।
आगे की तस्वीर अधिक स्पष्ट तब होगी, जब राजनीतिक दल गठबंधन, सीट-बंटवारे, साझा कार्यक्रम या नेतृत्व को लेकर ठोस घोषणाएं करेंगे। फिलहाल, उपलब्ध रिपोर्टें दक्षिण भारत में राजनीतिक संपर्कों और विकल्पों पर विचार-विमर्श की ओर इशारा करती हैं, लेकिन 2029 के लिए अंतिम गठबंधन-मानचित्र अभी तय नहीं है।
सत्यापन संबंधी टिप्पणी: लेख का आधार प्रकाशित समाचार रिपोर्टें हैं। नायडू और विजय की मुलाकात तथा जगन के चुनाव आयोग संबंधी रुख पर रिपोर्ट उपलब्ध हैं। हालांकि, 2029 के लिए किसी नए साझा मोर्चे, YSRCP के INDIA गठबंधन में औपचारिक प्रवेश या DMK-कांग्रेस संबंधों के अंतिम रूप से टूटने की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।