हवा में प्रदूषण बढ़ने पर कई लोगों को खांसी, गले में खराश, आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी महसूस होने लगती है। इसकी एक बड़ी वजह हवा में मौजूद सूक्ष्म कण और गैसीय प्रदूषक हैं, जो सांस के साथ श्वसन तंत्र में पहुंचकर जलन और सूजन पैदा कर सकते हैं। खासतौर पर PM2.5 जैसे बारीक कण फेफड़ों के भीतर तक पहुंच सकते हैं और लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से श्वसन तथा हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, वायु प्रदूषण का असर अल्पकालिक और दीर्घकालिक, दोनों तरह से स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
प्रदूषण बढ़ने पर खांसी क्यों होती है?
जब प्रदूषित हवा सांस के जरिए शरीर में जाती है तो नाक, गले और श्वसन नलिकाओं का संपर्क धूल, धुएं और दूसरे प्रदूषकों से होता है। PM10 जैसे अपेक्षाकृत बड़े कण आंख, नाक और गले में जलन पैदा कर सकते हैं, जबकि PM2.5 के कण फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंच सकते हैं।
WHO के अनुसार, वायु प्रदूषण के प्रमुख स्वास्थ्य-संबंधी प्रदूषकों में पार्टिकुलेट मैटर, कार्बन मोनोऑक्साइड, ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड शामिल हैं। इनमें सूक्ष्म कणों का स्वास्थ्य पर प्रभाव विशेष रूप से अच्छी तरह दर्ज किया गया है।
प्रदूषित हवा के संपर्क में आने के बाद कुछ लोगों में खांसी या सांस से जुड़ी परेशानी जल्दी दिखाई दे सकती है। खासकर जिन लोगों को पहले से अस्थमा या फेफड़ों की बीमारी है, उनमें प्रदूषण के कारण लक्षण बढ़ सकते हैं। बच्चों और बुजुर्गों में भी संवेदनशीलता अधिक हो सकती है।
क्या प्रदूषण की खांसी खतरनाक हो सकती है?
हर बार प्रदूषण के कारण होने वाली खांसी किसी गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होती। लेकिन लगातार या ज्यादा प्रदूषण के संपर्क में रहना स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है।
WHO के मुताबिक, ज्यादा स्तर के पार्टिकुलेट मैटर के अल्पकालिक संपर्क से फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, श्वसन संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है और अस्थमा की समस्या बढ़ सकती है। लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क को हृदय रोग, स्ट्रोक, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) और फेफड़ों के कैंसर जैसे गंभीर स्वास्थ्य प्रभावों से जोड़ा गया है।
इसका मतलब यह नहीं है कि प्रदूषण के दौरान होने वाली हर खांसी किसी गंभीर बीमारी की वजह से है। खांसी के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं, इसलिए लंबे समय तक बने रहने वाले या गंभीर लक्षणों में चिकित्सकीय जांच जरूरी है।
किन लोगों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए?
प्रदूषण का असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता। WHO और अमेरिकी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र (CDC) के अनुसार, कुछ समूह वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। इनमें शामिल हैं:
- बच्चे
- बुजुर्ग
- गर्भवती महिलाएं
- अस्थमा या COPD जैसी फेफड़ों की बीमारी वाले लोग
- हृदय रोग से जूझ रहे लोग
CDC के अनुसार, पार्टिकुलेट प्रदूषण अस्थमा के लक्षणों को बढ़ा सकता है।
प्रदूषण बढ़ने पर खांसी और सांस की परेशानी से कैसे बचें?
बचाव का सबसे प्रभावी तरीका प्रदूषित हवा के संपर्क को कम करना है। इसके लिए कुछ व्यावहारिक कदम अपनाए जा सकते हैं:
1. बाहर निकलने से पहले वायु गुणवत्ता देखें
जब वायु गुणवत्ता खराब हो, तो लंबे समय तक बाहर रहने और विशेष रूप से भारी प्रदूषण वाले इलाकों में जाने से बचना उपयोगी है।
2. प्रदूषण वाले समय में बाहर की गतिविधियां कम करें
खराब वायु गुणवत्ता के दौरान लंबे समय तक बाहर व्यायाम या अन्य शारीरिक गतिविधियां करने से प्रदूषित हवा का ज्यादा मात्रा में सांस के साथ शरीर में जाना संभव है।
3. धुएं के अतिरिक्त स्रोतों से भी बचें
सिगरेट का धुआं, कचरा जलाने का धुआं और घर के भीतर प्रदूषण पैदा करने वाले स्रोत भी श्वसन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। WHO के अनुसार, घरेलू और बाहरी दोनों तरह का वायु प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है।
4. डॉक्टर की सलाह के बिना दवा शुरू न करें
अगर पहले से अस्थमा या कोई दूसरी सांस की बीमारी है, तो डॉक्टर द्वारा बताई गई उपचार योजना का पालन करें। प्रदूषण की वजह मानकर खुद से एंटीबायोटिक, खांसी की दवा या अन्य दवा लेना उचित नहीं है।
5. लक्षण बने रहें तो चिकित्सक से संपर्क करें
लगातार खांसी, सांस फूलना, सीने में दर्द, सीटी जैसी आवाज के साथ सांस लेना या लक्षणों का लगातार बढ़ना हो तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।
कब तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए?
अगर खांसी के साथ सांस लेने में गंभीर परेशानी, सीने में तेज दर्द, होंठ या चेहरा नीला पड़ना, बेहोशी या अचानक गंभीर कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इसे केवल प्रदूषण की सामान्य समस्या मानकर घर पर इंतजार नहीं करना चाहिए और तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
वहीं, लगातार बनी रहने वाली खांसी या बार-बार होने वाली सांस की समस्या के पीछे प्रदूषण के अलावा संक्रमण, एलर्जी, अस्थमा या अन्य कारण भी हो सकते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में डॉक्टर की जांच जरूरी है।
प्रदूषण का असर केवल खांसी तक सीमित नहीं
वायु प्रदूषण का प्रभाव सिर्फ गले में खराश या खांसी तक सीमित नहीं है। WHO के अनुसार, प्रदूषित हवा के संपर्क का संबंध श्वसन और हृदय संबंधी कई बीमारियों से है। PM2.5 जैसे बारीक कण फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं और रक्तप्रवाह में भी प्रवेश कर सकते हैं।
WHO के अनुसार, बाहरी और घरेलू वायु प्रदूषण का संयुक्त प्रभाव हर साल लगभग 67 लाख समयपूर्व मौतों से जुड़ा है। 2019 के वैश्विक अनुमान में बाहरी वायु प्रदूषण से लगभग 42 लाख समयपूर्व मौतें जुड़ी थीं।
इसलिए प्रदूषण बढ़ने पर खांसी को केवल मौसमी परेशानी मानकर लगातार नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। खासकर पहले से सांस या हृदय संबंधी बीमारी वाले लोगों को खराब हवा के दिनों में अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
फैक्ट-चेक नोट: इस लेख में किसी व्यक्तिगत डॉक्टर का कथित बयान या ऐसा कोई स्थानीय प्रदूषण आंकड़ा शामिल नहीं किया गया है जिसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हो सकी। इसलिए “डॉक्टर से जानें” वाले शीर्षक को सामान्य चिकित्सकीय सलाह के बजाय वैज्ञानिक और आधिकारिक स्वास्थ्य स्रोतों पर आधारित जानकारी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।