दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर 2026 को हुई इंडिया गठबंधन की रैली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके और संगठन का शीर्ष नेतृत्व नजर नहीं आया। दिलचस्प बात यह है कि CJP ने इससे तीन दिन पहले ही इस रैली को अपना समर्थन देने का ऐलान किया था। संगठन ने रैली के मुद्दे का समर्थन किया, लेकिन उसमें शामिल होने से परहेज किया। इस फैसले के पीछे अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की रणनीति को प्रमुख वजह माना जा रहा है। हालांकि, रैली में शामिल होने का निमंत्रण मिलने और संगठन की भागीदारी को लेकर अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में अलग-अलग जानकारी सामने आई है।
यह रैली मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों के बीच आयोजित की गई थी। इसमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस और वामपंथी दलों के नेता तथा कार्यकर्ता शामिल हुए।
पहले समर्थन, फिर रैली से दूरी क्यों?
CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने 28 अक्टूबर को सोशल मीडिया मंच X पर इंडिया गठबंधन की रैली का समर्थन किया था। उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए संगठन की ओर से रैली के मुद्दे के प्रति समर्थन जताया था।
लेकिन 31 अक्टूबर को दीपके ने स्पष्ट किया कि CJP रैली में शामिल नहीं होगी। उनका कहना था कि संगठन मुद्दे के साथ है, लेकिन अपनी स्वतंत्र और तटस्थ पहचान बनाए रखना चाहता है।
इस फैसले से एक बात साफ हुई कि CJP चुनाव आयोग के खिलाफ उठाए गए मुद्दे पर विपक्ष के साथ खड़ी दिखना चाहती है, लेकिन किसी राजनीतिक गठबंधन के मंच का हिस्सा बनने से बच रही है।
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से कैसे जुड़ी CJP?
CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर सितंबर 2026 में अपना अभियान शुरू किया था। संगठन ने 24 सितंबर को ‘इलेक्शन कमीशन ठीक करो’ अभियान की शुरुआत करते हुए 48 घंटे के भीतर उनके इस्तीफे की मांग उठाई थी।
इसके बाद 2 अक्टूबर को मुंबई में CJP की ओर से प्रदर्शन किया गया। संगठन ने 10 अक्टूबर को भी बड़े विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था। इस बीच छात्र संगठनों ने भी दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की कोशिश की।
धीरे-धीरे मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी और वोट चोरी के आरोपों को लेकर विपक्षी दलों ने भी आवाज तेज की। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को निशाने पर लिया। इसी मुद्दे पर इंडिया गठबंधन ने 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली आयोजित की।
इस तरह जिस मांग को CJP ने पहले अपने अभियान का हिस्सा बनाया था, वही बाद में विपक्षी गठबंधन की रैली का भी प्रमुख मुद्दा बन गई।
क्या अपनी अलग राजनीतिक पहचान बचाना चाहती है CJP?
CJP की गैरमौजूदगी को समझने के लिए उसके संगठनात्मक स्वरूप और आगे की रणनीति पर भी ध्यान देना जरूरी है।
बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल ने कहा कि CJP फिलहाल किसी राजनीतिक दल या गठबंधन के साथ अपनी पहचान जोड़ने से बचना चाहती है। इसकी वजह यह हो सकती है कि भविष्य में संगठन किसी बड़े आंदोलन का नेतृत्व करना चाहे तो उस पर किसी राजनीतिक दल के साथ पहले से जुड़े होने का आरोप न लगे।
उनके अनुसार, किसी मुद्दे का समर्थन करना और किसी राजनीतिक गठबंधन के मंच पर शामिल होना दो अलग बातें हैं।
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी ने भी CJP के फैसले को रणनीति और मजबूरी, दोनों नजरियों से देखने की बात कही। उनके मुताबिक, चुनाव आयोग के खिलाफ पहले के प्रदर्शनों के बाद संगठन को गैर-राजनीतिक आंदोलन की अपनी पहचान को लेकर आलोचना का सामना करना पड़ा था। ऐसे में इंडिया गठबंधन की रैली में मंच साझा करने से उसकी स्वतंत्र छवि प्रभावित हो सकती थी।
हालांकि, सरकार की ओर से किसी दबाव के कारण CJP के पीछे हटने का कोई पुष्ट प्रमाण सामने नहीं आया है। इसलिए इसे संगठन की मजबूरी बताना फिलहाल उचित नहीं होगा।
रैली में CJP की मौजूदगी को लेकर क्या सामने आया?
CJP के शीर्ष नेतृत्व की गैरमौजूदगी के बावजूद रामलीला मैदान में संगठन से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं की मौजूदगी की खबरें सामने आईं।
बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के मुताबिक, रैली में CJP से जुड़ी कुछ युवा कार्यकर्ता मौजूद थीं। संगठन के कार्यकर्ता मोहम्मद जुनैद ने भी मीडिया से बातचीत में कहा कि रामलीला मैदान में CJP के कार्यकर्ता और युवा प्रदर्शनकारी आए थे।
इससे स्पष्ट होता है कि संगठन के नेतृत्व ने आधिकारिक तौर पर रैली में शामिल नहीं होने का फैसला किया था, लेकिन उसके मुद्दे से जुड़े कुछ समर्थक वहां पहुंचे थे।
वहीं, दैनिक जागरण की 1 नवंबर की रिपोर्ट में दावा किया गया कि CJP को रैली का औपचारिक निमंत्रण नहीं मिला था। रिपोर्ट के अनुसार, संगठन के कुछ नेता वहां पहुंचे थे, लेकिन मंच पर CJP को आधिकारिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
इस मामले में निमंत्रण को लेकर दोनों रिपोर्टों के विवरण अलग हैं। इसलिए यह निश्चित रूप से कहना मुश्किल है कि संगठन ने निमंत्रण मिलने के बाद ही शामिल न होने का फैसला किया था या उसे औपचारिक रूप से बुलाया ही नहीं गया था।
क्या CJP के लिए आगे की राह आसान होगी?
CJP के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपने आंदोलन को लगातार सक्रिय बनाए रखने और व्यापक जनसमर्थन जुटाने की है।
विजय त्रिवेदी के मुताबिक, केवल किसी मुद्दे को उठाने से आंदोलन लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकता। इसके लिए मजबूत संगठनात्मक ढांचा, जनता से सीधा संपर्क और लगातार सक्रियता जरूरी होती है।
CJP के प्रदर्शनों में युवाओं की भागीदारी जरूर दिखाई दी है, लेकिन इसे व्यापक जनसमर्थन में बदलना संगठन के लिए चुनौती हो सकता है।
अभिजीत दीपके ने दिवाली के बाद फिर से प्रदर्शन की तैयारी करने की बात कही थी। हालांकि, आगे किस तारीख को और किस स्वरूप में आंदोलन होगा, इसकी विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है।
फिलहाल CJP का रुख यही संकेत देता है कि वह ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और चुनाव आयोग से जुड़े सवालों पर विपक्ष के साथ मुद्दे के स्तर पर खड़ी रहना चाहती है, लेकिन अपनी संगठनात्मक पहचान को किसी गठबंधन में शामिल करके सीमित नहीं करना चाहती।
इसलिए इंडिया गठबंधन की रैली से उसकी दूरी को केवल राजनीतिक मजबूरी कहना सही नहीं होगा। उपलब्ध बयानों और घटनाक्रम के आधार पर स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की रणनीति इसकी एक प्रमुख वजह नजर आती है।
संपादकीय सत्यापन नोट: रैली की तारीख, स्थान, CJP के समर्थन और अभिजीत दीपके के फैसले की पुष्टि उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों से की गई है। रैली के औपचारिक निमंत्रण को लेकर रिपोर्टों में अंतर है। सरकारी दबाव की कोई स्वतंत्र पुष्टि नहीं मिली है। वरिष्ठ पत्रकारों की टिप्पणियों को उनके विश्लेषण के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है।