दिल्ली में सर्दियां शुरू होते ही वायु प्रदूषण बढ़ने लगता है। अक्टूबर से हवा की गुणवत्ता में गिरावट का सिलसिला शुरू होता है और नवंबर से जनवरी के बीच कई बार स्थिति गंभीर हो जाती है। इसकी वजह केवल पंजाब और हरियाणा में पराली जलाना नहीं है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्यों की धूल, कचरा जलाना और मौसम में बदलाव मिलकर दिल्ली-NCR की हवा को खराब करते हैं।
केंद्रीय वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की जनवरी 2026 की विशेषज्ञ रिपोर्ट में भी स्पष्ट किया गया है कि दिल्ली के प्रदूषण के पीछे स्थानीय और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले दोनों तरह के उत्सर्जन जिम्मेदार हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सर्दियों में PM2.5 प्रदूषण का सबसे बड़ा हिस्सा ऐसे सूक्ष्म कणों का है, जो वातावरण में अलग-अलग गैसों की रासायनिक प्रतिक्रिया से बनते हैं।
सवाल यह है कि प्रदूषण के स्रोत पूरे साल मौजूद रहने के बावजूद सर्दियों में दिल्ली की हवा इतनी खराब क्यों हो जाती है? इसका जवाब मौसम और प्रदूषण के संयुक्त प्रभाव में छिपा है।
दिल्ली में सर्दियों के दौरान प्रदूषण क्यों बढ़ता है?
1. हवा की रफ्तार कम होने से प्रदूषण एक जगह जमा होता है
सर्दियों में दिल्ली और आसपास के इलाकों में कई बार हवा की रफ्तार काफी कम हो जाती है। सामान्य दिनों में हवा प्रदूषकों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक फैलाने में मदद करती है। लेकिन जब हवा धीमी पड़ती है, तो वाहनों, फैक्ट्रियों और अन्य स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषक वातावरण में जमा होने लगते हैं।
इसके साथ ही जमीन के पास मौजूद हवा का ऊपर की हवा से मिलना भी कम हो जाता है। इससे प्रदूषण का फैलाव सीमित रहता है और सांस लेने वाली सतह के आसपास प्रदूषकों की मात्रा बढ़ जाती है।
2. टेम्परेचर इन्वर्जन भी बढ़ाता है परेशानी
सर्दियों में दिल्ली के प्रदूषण की एक प्रमुख वजह टेम्परेचर इन्वर्जन (Temperature Inversion) है। सामान्य परिस्थितियों में जमीन के पास की गर्म हवा ऊपर उठती है और प्रदूषकों को भी अपने साथ ले जाती है।
लेकिन टेम्परेचर इन्वर्जन के दौरान जमीन के करीब ठंडी हवा और उसके ऊपर अपेक्षाकृत गर्म हवा की परत बन जाती है। इससे निचली हवा का ऊपर उठना मुश्किल हो जाता है।
नतीजतन, प्रदूषण जमीन के करीब फंसा रहता है। जब इसके साथ हवा की रफ्तार भी कम हो, तो स्मॉग की स्थिति और गंभीर हो सकती है।
3. पराली का धुआं दिल्ली तक पहुंचता है
अक्टूबर और नवंबर में पंजाब, हरियाणा और आसपास के कृषि क्षेत्रों में धान की कटाई के बाद पराली जलाने की घटनाएं होती हैं। इससे निकलने वाला धुआं हवा के साथ दूसरे इलाकों तक पहुंच सकता है।
हवा की दिशा दिल्ली की ओर होने पर इसका असर राजधानी की वायु गुणवत्ता पर भी पड़ता है। विशेष रूप से फसल कटाई के मौसम में पराली का धुआं प्रदूषण के स्तर में तेजी से बढ़ोतरी कर सकता है।
हालांकि, दिल्ली के प्रदूषण को केवल पराली से जोड़ना सही नहीं है। CAQM की रिपोर्ट में बायोमास जलाने को एक व्यापक श्रेणी के रूप में शामिल किया गया है, जिसमें कृषि अवशेषों के अलावा अन्य तरह का जैविक ईंधन जलाना भी शामिल है।
4. वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों का लगातार उत्सर्जन
दिल्ली-NCR में बड़ी संख्या में वाहन चलते हैं। ट्रैफिक जाम, डीजल वाहनों से निकलने वाला धुआं और वाहनों के टायर तथा ब्रेक से निकलने वाले कण भी प्रदूषण में योगदान देते हैं।
इसके अलावा औद्योगिक इकाइयों, बिजली संयंत्रों और निर्माण गतिविधियों से भी प्रदूषक वातावरण में पहुंचते हैं।
गर्मियों और मानसून में इन प्रदूषकों का फैलाव अपेक्षाकृत बेहतर हो सकता है, लेकिन सर्दियों में प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियां इन्हें जमीन के करीब रोक देती हैं।
5. सड़क और निर्माण स्थलों की धूल
दिल्ली में सड़क की धूल, खुले निर्माण स्थल, मिट्टी और निर्माण एवं तोड़फोड़ से निकलने वाले कण भी वायु प्रदूषण के स्रोत हैं।
वाहनों के गुजरने से सड़क पर जमी धूल दोबारा हवा में फैलती है। निर्माण स्थलों पर उचित धूल नियंत्रण नहीं होने से भी PM10 और PM2.5 जैसे प्रदूषकों की मात्रा प्रभावित होती है।
6. कचरा और बायोमास जलाने से बढ़ता है धुआं
खुले में कचरा जलाना, लकड़ी और अन्य ठोस ईंधन का इस्तेमाल भी प्रदूषण को बढ़ाता है। सर्दियों में कुछ स्थानों पर ठंड से बचने के लिए अलाव जलाए जाते हैं। इससे निकलने वाला धुआं पहले से प्रदूषित हवा को और खराब कर सकता है।
दिल्ली-NCR में प्रदूषण के अलग-अलग स्रोत एक साथ सक्रिय रहते हैं। मौसम की स्थिति अनुकूल नहीं होने पर इनका संयुक्त असर ज्यादा दिखाई देता है।
CAQM की रिपोर्ट में प्रदूषण के स्रोतों को लेकर क्या सामने आया?
20 फरवरी 2026 को केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने PIB के माध्यम से CAQM की विशेषज्ञ रिपोर्ट से जुड़ी जानकारी जारी की थी। यह रिपोर्ट 2015 से 2025 के बीच किए गए अलग-अलग स्रोत-विश्लेषण अध्ययनों के आधार पर तैयार की गई है।
रिपोर्ट में सर्दियों के दौरान दिल्ली के PM2.5 प्रदूषण में विभिन्न स्रोतों का अनुमानित योगदान इस प्रकार बताया गया है:
| प्रदूषण का स्रोत | अनुमानित योगदान |
|---|---|
| सेकेंडरी पार्टिकुलेट्स | 27% |
| परिवहन और वाहन | 23% |
| बायोमास जलाना | 20% |
| धूल | 15% |
| उद्योग और थर्मल पावर प्लांट | 9% |
| अन्य स्रोत | 6% |
इन आंकड़ों में सबसे अधिक 27 प्रतिशत योगदान सेकेंडरी पार्टिकुलेट्स का है। ये ऐसे सूक्ष्म कण होते हैं, जो सीधे किसी वाहन या फैक्ट्री से नहीं निकलते, बल्कि वातावरण में गैसों की रासायनिक प्रतिक्रिया के बाद बनते हैं।
उदाहरण के लिए, वाहनों, उद्योगों और बिजली संयंत्रों से निकलने वाली कुछ गैसें वातावरण में प्रतिक्रिया करके सूक्ष्म कणों का निर्माण करती हैं।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि ये आंकड़े अलग-अलग अध्ययनों के विश्लेषण पर आधारित अनुमान हैं। इन्हें हर दिन या हर प्रदूषण स्तर पर लागू नहीं किया जा सकता।
गर्मियों और मानसून में दिल्ली की हवा बेहतर क्यों रहती है?
गर्मियों और मानसून के दौरान मौसम की परिस्थितियां प्रदूषकों के फैलाव में मदद करती हैं। कई बार तेज हवाएं प्रदूषण को एक जगह जमा नहीं होने देतीं। वहीं मानसून में बारिश के कारण हवा में मौजूद धूल के कण जमीन पर आ जाते हैं।
इसके मुकाबले सर्दियों में कम हवा की रफ्तार, कम तापमान और तापमान उलटाव जैसी परिस्थितियां प्रदूषकों को वातावरण में रोक सकती हैं।
दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग ने भी अपनी आधिकारिक जानकारी में सर्दियों के दौरान हवा की गति, दिशा, नमी और तापमान को प्रदूषण की स्थिति प्रभावित करने वाले प्रमुख मौसमी कारकों में शामिल किया है।
यानी सर्दियों में प्रदूषण केवल इसलिए नहीं बढ़ता कि उत्सर्जन अचानक बहुत ज्यादा हो जाता है, बल्कि इसलिए भी बढ़ता है क्योंकि वातावरण में मौजूद प्रदूषकों को बाहर फैलने का पर्याप्त मौका नहीं मिलता।
क्या सिर्फ पराली जलाने पर रोक लगाने से साफ होगी दिल्ली की हवा?
दिल्ली के प्रदूषण को कम करने के लिए पराली जलाने पर नियंत्रण जरूरी है, लेकिन इससे अकेले समस्या का समाधान नहीं होगा।
CAQM की रिपोर्ट के अनुसार, वाहनों, उद्योगों, बायोमास जलाने और धूल जैसे स्रोत भी प्रदूषण में बड़ा योगदान देते हैं। इसलिए दिल्ली-NCR में प्रदूषण कम करने के लिए कई स्तरों पर काम करना जरूरी है।
इसके लिए प्रमुख कदम हैं:
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पुराने और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर प्रभावी नियंत्रण।
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सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना और निजी वाहनों पर निर्भरता कम करना।
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निर्माण स्थलों और सड़कों पर धूल नियंत्रण के नियमों का पालन।
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औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले उत्सर्जन की निगरानी।
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खुले में कचरा और बायोमास जलाने पर रोक।
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पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के बीच क्षेत्रीय स्तर पर समन्वय।
दिल्ली में प्रदूषण का स्तर गंभीर होने पर ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) के तहत अलग-अलग चरणों में प्रतिबंध लागू किए जाते हैं। इनका उद्देश्य प्रदूषण बढ़ने पर तत्काल नियंत्रण के उपाय करना है। हालांकि, स्थायी सुधार के लिए पूरे साल उत्सर्जन कम करना जरूरी है।
दिल्ली की सर्दियों में खराब होती हवा के पीछे कोई एक वजह नहीं है। पराली का धुआं कुछ समय के लिए प्रदूषण बढ़ा सकता है, लेकिन वाहनों, उद्योगों, धूल और अन्य स्थानीय स्रोतों का योगदान भी लगातार बना रहता है। मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां इन सभी प्रदूषकों को जमीन के करीब जमा कर देती हैं। यही वजह है कि हर साल सर्दियां आते ही दिल्ली-NCR में स्मॉग और खराब हवा की समस्या फिर सामने आने लगती है।
संपादकीय सत्यापन नोट:
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PM2.5 के प्रतिशत CAQM की जनवरी 2026 की रिपोर्ट और 20 फरवरी 2026 की सरकारी विज्ञप्ति से लिए गए हैं।
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बायोमास जलाने के आंकड़े को केवल पराली जलाने का योगदान नहीं माना गया है।
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5 नवंबर 2026 का कोई अपुष्ट AQI आंकड़ा शामिल नहीं किया गया है।
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लेख में किसी अधिकारी का काल्पनिक बयान या अप्रमाणित उद्धरण शामिल नहीं है।
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मौसमी कारणों और प्रदूषण के स्रोतों को उपलब्ध सरकारी एवं विशेषज्ञ रिपोर्टों के आधार पर समझाया गया है।