हरियाणा के सोनीपत की 18 वर्षीय पहलवान काजल ढोचक ने सीनियर विश्व कुश्ती चैंपियनशिप 2026 में रजत पदक जीतकर भारतीय महिला कुश्ती में अपनी अलग पहचान बनाई है। कजाकिस्तान की राजधानी अस्ताना में 28 अक्टूबर को महिलाओं के 76 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में काजल को यूक्रेन की अनास्तासिया अल्पियेवा से 6-8 से हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद वह विश्व चैंपियनशिप के हेवीवेट वर्ग में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान बनीं। भारतीय महिला कुश्ती टीम के मुख्य कोच वीरेंद्र दहिया ने उनकी सीखने और लगातार बेहतर बनने की ललक की तुलना सचिन तेंदुलकर से की है।
कौन हैं काजल ढोचक?
काजल ढोचक हरियाणा के सोनीपत जिले से आती हैं। कुश्ती से उनका जुड़ाव बचपन में ही हो गया था। उनके मामा नहीं, बल्कि उनके चाचा कृष्ण ढोचक खुद पूर्व अंतरराष्ट्रीय पहलवान रहे हैं। काजल ने अपने बड़े भाई को कुश्ती का अभ्यास करते देखा और उनके साथ अखाड़े जाने की इच्छा जताई। धीरे-धीरे यह रुचि गंभीर अभ्यास में बदल गई।
कृष्ण ढोचक ने शुरुआती दौर में उन्हें कुश्ती के गुर सिखाए। जब परिवार को उनकी प्रतिभा और खेल में आगे बढ़ने की संभावना दिखाई दी, तो उनके प्रशिक्षण को अधिक व्यवस्थित बनाने का फैसला किया गया। 14 वर्ष की उम्र में काजल सोनीपत स्थित कुलदीप मलिक की खेल अकादमी से जुड़ गईं। इसके बाद उनकी ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं का स्तर लगातार बढ़ता गया।
अंडर-17 से सीनियर विश्व चैंपियनशिप तक का सफर
काजल की उपलब्धियों का सिलसिला सीनियर स्तर पर पहुंचने से पहले ही शुरू हो गया था। उन्होंने 2024 में अंडर-17 विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीता। इसके बाद 2025 और 2026 में लगातार दो अंडर-20 विश्व चैंपियनशिप खिताब अपने नाम किए।
2026 में उन्होंने अंडर-20 विश्व चैंपियनशिप के 76 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में चीन की जिंगरू सुन को 7-0 से हराकर खिताब बरकरार रखा था। जूनियर स्तर पर लगातार सफलता के बाद सीनियर विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतना उनके करियर का अगला बड़ा पड़ाव रहा।
काजल का सीनियर विश्व चैंपियनशिप में प्रदर्शन इसलिए भी उल्लेखनीय रहा, क्योंकि उन्हें यहां अनुभवी अंतरराष्ट्रीय पहलवानों का सामना करना पड़ा। उन्होंने सेमीफाइनल में पिछड़ने के बाद वापसी करके फाइनल में जगह बनाई और फिर खिताबी मुकाबले में भी आखिरी क्षणों तक चुनौती पेश की।
सेमीफाइनल में 1-7 से पिछड़ने के बाद की वापसी
काजल ने सेमीफाइनल में किर्गिस्तान की पहलवान ऐपेरी मेडेट किजी के खिलाफ मुकाबले की शुरुआत में 1-7 से पिछड़ने के बावजूद हार नहीं मानी। उन्होंने जोरदार वापसी करते हुए मुकाबला 10-7 से जीत लिया और फाइनल में प्रवेश किया। मेडेट किजी अनुभवी अंतरराष्ट्रीय पहलवान हैं और विश्व चैंपियनशिप में पदक जीत चुकी हैं।
फाइनल में काजल के सामने यूक्रेन की अनास्तासिया अल्पियेवा थीं, जो दो बार की यूरोपीय चैंपियन हैं। मुकाबले के आखिरी आधे मिनट में स्कोर 4-4 था और काजल तकनीकी मानदंड के आधार पर बढ़त पर थीं। इसी दौरान अल्पियेवा ने चार अंकों का दांव लगाकर मुकाबले का रुख बदल दिया।
काजल ने अंतिम 13 सेकंड में दो अंक हासिल किए, लेकिन तब तक अंतर पाटने के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा था। मुकाबला 8-6 से अल्पियेवा के पक्ष में समाप्त हुआ और काजल को रजत पदक मिला।
सचिन तेंदुलकर से क्यों हुई तुलना?
काजल की चर्चा केवल पदक की वजह से नहीं हो रही है। भारतीय महिला कुश्ती टीम के मुख्य कोच वीरेंद्र दहिया ने उनकी सीखने की ललक और खुद को बेहतर बनाने की इच्छा की तुलना क्रिकेट के दिग्गज सचिन तेंदुलकर से की है।
यह तुलना दोनों खिलाड़ियों की उपलब्धियों को समान बताने के लिए नहीं, बल्कि खेल के प्रति उनकी भूख को रेखांकित करने के लिए की गई है। कोच के मुताबिक, काजल लगातार सुधार करना चाहती हैं और अभ्यास के दौरान अपने लक्ष्य को लेकर गंभीर रहती हैं।
उनकी आक्रामक शैली भी उनकी पहचान का हिस्सा है। हालांकि, कोचों के अनुसार सीनियर स्तर पर उन्हें अपनी रक्षात्मक तकनीक पर और काम करना होगा। विशेष रूप से पैरों के बचाव और मुकाबले के दौरान सही समय पर आक्रमण करने की क्षमता में सुधार उनके अगले चरण के लिए अहम रहेगा।
परिवार और अकादमी का रहा अहम योगदान
काजल के खेल सफर में परिवार और प्रशिक्षकों की भूमिका रही है। उनके पिता सोनीपत में चालक के रूप में काम करते हैं, जबकि उनकी मां घर संभालती हैं और उनके प्रशिक्षण तथा प्रतियोगिताओं के दौरान सहयोग करती हैं। चाचा कृष्ण ढोचक ने उन्हें शुरुआती प्रशिक्षण दिया और कुलदीप मलिक की अकादमी में उन्हें उच्च स्तर पर तैयारी करने का अवसर मिला।
काजल की सफलता के साथ भारतीय महिला कुश्ती में 76 किलोग्राम वर्ग की स्थिति पर भी ध्यान गया है। इस वर्ग में देश के भीतर प्रतिस्पर्धी पहलवानों की संख्या सीमित होने की बात उनके प्रशिक्षकों ने कही है। नियमित रूप से मजबूत प्रतिद्वंद्वियों के साथ अभ्यास और मुकाबले मिलना उनके विकास के लिए जरूरी होगा।
अब नजर ओलंपिक की तैयारी पर
काजल के सामने अगली चुनौती सीनियर स्तर पर अपनी जगह मजबूत करने की है। उनके प्रशिक्षकों का जोर उनकी आक्रामक शैली को बनाए रखते हुए रक्षात्मक तकनीक सुधारने पर है। विश्व चैंपियनशिप का रजत पदक उन्हें शीर्ष अंतरराष्ट्रीय पहलवानों के खिलाफ अपने खेल का आकलन करने का अवसर देता है।
लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 उनके बड़े लक्ष्यों में शामिल है। हालांकि, ओलंपिक में जगह बनाना और पदक जीतना अलग-अलग चुनौतियां हैं। इसके लिए उन्हें आगामी प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन जारी रखने के साथ अपनी तकनीक और अनुभव को भी मजबूत करना होगा।
18 वर्ष की उम्र में सीनियर विश्व चैंपियनशिप का रजत पदक जीतने वाली काजल ढोचक के लिए यह उपलब्धि उनके सफर का अंत नहीं, बल्कि सीनियर कुश्ती में आगे बढ़ने की शुरुआत है।
सत्यापन संबंधी टिप्पणी: लेख में उपलब्ध प्रकाशित समाचार रिपोर्टों से पुष्ट जानकारी का उपयोग किया गया है। काजल के विश्व चैंपियनशिप फाइनल का स्कोर 6-8 और पदक का रंग एक से अधिक रिपोर्टों में मेल खाते हैं। इस जांच में संबंधित प्रतियोगिता का मूल आधिकारिक परिणाम-पत्र स्वतंत्र रूप से प्राप्त नहीं हुआ।