नई दिल्ली, 23 अक्टूबर। भारतीय निर्वाचन आयोग के दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के वरिष्ठ अधिकारी मनीष गर्ग के कामकाज को लेकर 29 जुलाई 2026 को कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की थी। सूचना का अधिकार (RTI) के तहत सामने आए दस्तावेजों के मुताबिक, कैबिनेट सचिवालय ने शिकायतों पर सीधे कार्रवाई करने के बजाय दोनों आयुक्तों को पत्र मिलने की पुष्टि की और मामले की जानकारी मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय तथा कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेज दी। सचिवालय ने अपने रिकॉर्ड में यह भी दर्ज किया कि आयोग की ओर से औपचारिक सूचना के अभाव में कार्रवाई करना संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप माना जा सकता है।
चुनाव आयुक्तों ने किस अधिकारी के खिलाफ शिकायत की?
यह मामला वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग से जुड़ा है, जो भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के हिमाचल प्रदेश कैडर के अधिकारी हैं। उन्हें 2 सितंबर 2024 को निर्वाचन आयोग में तैनात किया गया था।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग में प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर विवाद उस समय सामने आया, जब प्रशासन विभाग के प्रभारी उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु 27 जुलाई से 9 अगस्त तक अवकाश पर थे। इस दौरान गर्ग को प्रशासन विभाग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था।
आरोप है कि अतिरिक्त जिम्मेदारी संभालने के कुछ ही घंटों के भीतर गर्ग ने 28 जुलाई को वरिष्ठ और समकक्ष अधिकारियों के बीच कार्य आवंटन से संबंधित आदेश जारी कर दिया। दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी शिकायतों में कहा कि इस बदलाव से पहले आयोग या संबंधित अधिकारियों से चर्चा नहीं की गई थी।
ये आरोप चुनाव आयुक्तों की शिकायतों और कैबिनेट सचिवालय की फाइल में दर्ज विवरण पर आधारित हैं। इन्हें मनीष गर्ग के खिलाफ किसी अंतिम आधिकारिक निष्कर्ष या दोषसिद्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
RTI से सामने आया पत्राचार का पूरा घटनाक्रम
सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से पता चला कि शिकायतें मिलने के बाद कैबिनेट सचिवालय ने क्या प्रक्रिया अपनाई।
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29 जुलाई 2026: चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे।
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30 जुलाई: दोनों पत्र कैबिनेट सचिवालय के रिकॉर्ड में दर्ज किए गए।
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3 और 4 अगस्त: अधिकारियों ने शिकायतों पर विचार किया। फाइल नोटिंग में मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय को मामले से अवगत कराने और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को जानकारी देने का प्रस्ताव दर्ज हुआ।
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5 अगस्त: कैबिनेट सचिव ने दोनों चुनाव आयुक्तों को पत्र मिलने की पुष्टि करते हुए जवाब भेजे। संबंधित जानकारी मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को भी भेजी गई।
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19 अक्टूबर: कैबिनेट सचिवालय ने RTI आवेदन के जवाब में संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध कराए जाने की जानकारी दी।
RTI आवेदन 24 सितंबर को दायर किया गया था। इसे पारदर्शिता के मुद्दों पर काम करने वाले सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश के. बत्रा ने दाखिल किया था। इस जानकारी से शिकायतों के प्राप्त होने और उन पर हुई प्रशासनिक प्रक्रिया की पुष्टि हुई।
कैबिनेट सचिवालय ने कार्रवाई क्यों नहीं की?
कैबिनेट सचिवालय की फाइल नोटिंग के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्रों को गंभीरता से लेने की बात कही गई, लेकिन उन्हें पूरे निर्वाचन आयोग की ओर से भेजा गया औपचारिक संदेश नहीं माना गया।
सचिवालय ने दर्ज किया कि निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और उसके कामकाज में कार्यपालिका का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। इसलिए आयोग की ओर से औपचारिक संचार के बिना संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करना अनुचित हो सकता है।
फाइल नोटिंग में यह भी कहा गया कि शिकायतों की जानकारी मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय को दी जानी चाहिए। साथ ही, संबंधित अधिकारी अखिल भारतीय सेवा के सदस्य हैं, इसलिए मामले को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के रिकॉर्ड में रखने का फैसला किया गया, ताकि भविष्य में उनसे जुड़े प्रशासनिक निर्णय लेते समय इसे ध्यान में रखा जा सके।
इस तरह, कैबिनेट सचिवालय ने शिकायतों पर सीधे दंडात्मक या अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की। उसने पत्रों की पावती भेजी और संबंधित अधिकारियों को जानकारी दी।
चुनाव आयुक्तों ने क्या आपत्तियां उठाई थीं?
रिपोर्ट के अनुसार, सुखबीर सिंह संधू ने अपने पत्र में कार्य आवंटन के आदेश पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि संशोधित जिम्मेदारियों के बारे में आयोग या उन्हें व्यक्तिगत रूप से चर्चा अथवा सूचना नहीं दी गई।
वहीं, विवेक जोशी ने अपने पत्र में प्रशासन विभाग से संबंधित फाइल मांगे जाने के बावजूद उपलब्ध नहीं कराए जाने की बात कही थी।
दोनों आयुक्तों की शिकायतों में यह भी आरोप था कि अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों में बदलाव करने से पहले आयोग की चर्चा या मंजूरी जरूरी थी और इस संबंध में पहले मौखिक तथा लिखित निर्देश दिए गए थे। ये बातें शिकायतों में उठाए गए आरोप हैं; उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है, जो संबंधित अधिकारी को इन आरोपों का दोषी ठहराता हो।
अब तक क्या स्पष्ट है और क्या नहीं?
RTI से सामने आए रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग पत्र लिखे थे और कैबिनेट सचिवालय ने उनका जवाब दिया था। यह भी सामने आया कि शिकायतों पर सीधे कार्रवाई न करने के पीछे संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता और औपचारिक संस्थागत प्रक्रिया को आधार बनाया गया।
हालांकि, शिकायतों के सभी पहलुओं, संबंधित अधिकारी के पूरे पक्ष और मामले में आगे किसी विभागीय कार्रवाई की स्थिति की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं होती। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि शिकायतों के आधार पर अधिकारी के खिलाफ कोई अंतिम फैसला हो चुका है।
फिलहाल इस मामले का प्रमुख पहलू निर्वाचन आयोग के भीतर प्रशासनिक कार्य आवंटन को लेकर उठी आपत्तियां और उन पर कैबिनेट सचिवालय की प्रतिक्रिया है। आगे की स्थिति स्पष्ट होने के लिए निर्वाचन आयोग या संबंधित विभागों की ओर से किसी अतिरिक्त आधिकारिक जानकारी का सामने आना महत्वपूर्ण होगा।
सत्यापन संबंधी नोट: लेख में घटनाक्रम का मिलान एक से अधिक समाचार रिपोर्टों से किया गया है। RTI के तहत सामने आए रिकॉर्ड का विवरण समाचार रिपोर्टों पर आधारित है; मूल RTI दस्तावेजों की स्वतंत्र रूप से जांच नहीं की गई। शिकायतों में लगाए गए आरोपों को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।