नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर उठे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल कर दिया है। आयोग ने एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि SIR से जुड़े तीनों प्रमुख आदेश आयोग के सभी सदस्यों की सहमति से लिए गए थे। साथ ही आयोग ने कहा कि फाइल पर किसी चुनाव आयुक्त की टिप्पणी, सवाल या सुझाव को अपने आप में आयोग का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
मामले की सुनवाई 27 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने होनी है। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।
चुनाव आयोग ने क्या जवाब दिया?
आयोग की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि SIR से संबंधित 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 के तीनों आदेश सर्वसम्मति से लिए गए थे। हलफनामा उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरू की ओर से दाखिल किया गया और आयोग के अनुसार इसे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मंजूरी दी है।
आयोग का कहना है कि याचिकाओं में उठाए गए आरोप एक समाचार रिपोर्ट पर आधारित हैं और याचिकाकर्ता ने संबंधित पक्षों से उन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की। आयोग ने यह भी कहा कि उसने किसी आंतरिक फाइल या नोट को मीडिया में जारी नहीं किया।
फिर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का सवाल क्यों उठा?
विवाद की शुरुआत उन रिपोर्टों से हुई जिनमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्तियां दर्ज की थीं।
आयोग ने अपने जवाब में इन टिप्पणियों को अंतिम निर्णय से अलग बताया है। उसके मुताबिक किसी फाइल पर दर्ज सवाल, सुझाव, टिप्पणी या आपत्ति अपने आप में आयोग का निर्णय नहीं होती। आयोग ने बताया कि सामान्य प्रक्रिया में फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त के पास जाती है, फिर दूसरे और उसके बाद मुख्य चुनाव आयुक्त के पास पहुंचती है। जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी ली जा सकती है और बाद में उसे फाइल पर दर्ज किया जाता है।
यही वह बिंदु है जिस पर मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने रिकॉर्ड की भूमिका अहम हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि वह केवल किसी समाचार रिपोर्ट के आधार पर फैसला नहीं करेगा और संबंधित रिकॉर्ड तथा पक्षों के जवाब देखेगा।
Form 6 पर भी आयोग ने सफाई दी
SIR विवाद में Form 6 का मुद्दा भी प्रमुख है। यह फॉर्म मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि उसने Form 6 में कोई कानूनी संशोधन नहीं किया। आयोग के अनुसार, Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित Form 6 में बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।
आयोग ने कहा कि SIR के दौरान मांगा गया अतिरिक्त declaration अलग दस्तावेज था। हालांकि, आयोग के जवाब में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ऑनलाइन प्रक्रिया में Form 6 और SIR declaration को अलग-अलग दिखाने की व्यवस्था बाद में की गई।
28 जुलाई के work allocation order पर क्या कहा?
आयोग ने अपने हलफनामे में 28 जुलाई 2026 के एक internal work allocation order का भी उल्लेख किया है। इसके मुताबिक यह आदेश आयोग में deputation पर तैनात एक Additional Secretary स्तर के अधिकारी ने जारी किया था।
आयोग ने कहा कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने 29 जुलाई को इस आदेश और अधिकारी के आचरण को लेकर कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे थे। इसके बाद 30 जुलाई को दोनों चुनाव आयुक्तों के संयुक्त निर्देश के कारण यह आदेश लागू नहीं किया गया।
इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से उस समय आपत्ति दर्ज की गई थी। लेकिन आयोग का कहना है कि इससे यह साबित नहीं होता कि SIR से जुड़े अंतिम फैसले उनकी सहमति के बिना लिए गए।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले क्या कहा था?
5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं पर केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा था। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि आयोग की सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना किया गया।
उस समय अदालत ने ज्ञानेश कुमार को तत्काल पद से हटाने या काम करने से रोकने का अंतरिम आदेश देने से इनकार किया था। अदालत ने कहा था कि केवल किसी समाचार रिपोर्ट के आधार पर ऐसा आदेश नहीं दिया जा सकता और पहले चुनाव आयोग का जवाब तथा संबंधित रिकॉर्ड देखना जरूरी है।
पीठ ने यह भी संकेत दिया था कि यदि कोई फैसला कानून के मुताबिक न होने की पुष्टि होती है तो अदालत उस पर उचित कार्रवाई कर सकती है।
अब सबसे अहम सवाल क्या हैं?
चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में यह साफ करने की कोशिश की है कि SIR के अंतिम आदेश सर्वसम्मत थे और आंतरिक फाइलों पर दर्ज टिप्पणियां अंतिम फैसले नहीं थीं। लेकिन मामले की सुनवाई में रिकॉर्ड से जुड़े कुछ सवाल महत्वपूर्ण रहेंगे।
मसलन, जिन फैसलों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर आपत्तियां दर्ज की थीं, उनकी अंतिम मंजूरी किस स्तर पर और किस प्रक्रिया के तहत हुई? क्या संबंधित सदस्यों को अंतिम निर्णय से पहले पूरी जानकारी थी? फाइलों पर दर्ज आपत्तियों और बाद में जारी आदेशों के बीच क्या संबंध था? इन सवालों का जवाब अदालत के सामने रखे जाने वाले मूल रिकॉर्ड और पक्षों की दलीलों से स्पष्ट हो सकता है।
फिलहाल चुनाव आयोग ने एकतरफा निर्णय लेने के आरोप से इनकार किया है। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं की दलील है कि SIR से जुड़े कुछ फैसलों में आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट 27 अक्टूबर को इन याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। अदालत चुनाव आयोग के जवाब, संबंधित दस्तावेजों और याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर विचार करेगी। अभी तक अदालत ने यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि ज्ञानेश कुमार ने एकतरफा तरीके से कोई फैसला लिया था या चुनाव आयोग की प्रक्रिया कानून के विपरीत थी।
इसलिए फिलहाल यह कहना उचित होगा कि चुनाव आयोग ने आरोपों को खारिज करते हुए सभी प्रमुख SIR आदेशों को सर्वसम्मत बताया है, जबकि विवादित फाइलों और आपत्तियों को लेकर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष आना बाकी है।