1977 में धीरूभाई अंबानी की कंपनी रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज का सार्वजनिक शेयर निर्गम (IPO) भारतीय शेयर बाजार के इतिहास की अहम घटनाओं में शामिल हुआ। कंपनी के इस निर्गम को उपलब्ध शेयरों की तुलना में लगभग 7.19 गुना आवेदन मिले थे। निवेशकों की इस प्रतिक्रिया ने दिखाया कि भारतीय कंपनियों के कारोबार में आम लोगों की हिस्सेदारी बढ़ाने की कितनी संभावनाएं थीं।
उस समय कंपनी का नाम रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज लिमिटेड था। आज यही कारोबार रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के नाम से जाना जाता है। कंपनी के संस्थापक धीरूभाई अंबानी ने सार्वजनिक निवेश के जरिए कारोबार के विस्तार के लिए पूंजी जुटाई और बड़ी संख्या में लोगों को कंपनी का शेयरधारक बनने का अवसर मिला।
1977 में क्या हुआ था?
रिलायंस की 1976-77 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी के शेयरों की सार्वजनिक बिक्री के लिए आवेदन 15 नवंबर 1977 को खुले और 17 नवंबर को बंद हुए। यह बिक्री कंपनी के प्रवर्तक शेयरधारकों की ओर से की गई थी।
प्रस्ताव के तहत 28.20 लाख इक्विटी शेयर आम निवेशकों को बेचने के लिए रखे गए थे। प्रत्येक शेयर का अंकित मूल्य 10 रुपये था और बिक्री भी 10 रुपये प्रति शेयर की दर पर की गई। इसके अलावा, कंपनी ने आगे और शेयर जारी करने की योजनाओं का भी उल्लेख किया था।
कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, इस निर्गम के लिए उपलब्ध शेयरों की तुलना में 7.19 गुना आवेदन प्राप्त हुए। शेयरों के आवंटन का आधार 17 दिसंबर 1977 तक अंतिम रूप दे दिया गया था। इसके बाद रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज के शेयर 23 जनवरी 1978 से बॉम्बे और अहमदाबाद के स्टॉक एक्सचेंजों में सूचीबद्ध हुए।
इस तरह, निर्गम 1977 में आया, जबकि शेयरों की एक्सचेंज पर ट्रेडिंग की शुरुआत जनवरी 1978 में हुई। दोनों तारीखों के बीच अंतर समझना जरूरी है।
रिलायंस के IPO ने शेयर बाजार की तस्वीर कैसे बदली?
1. आम निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने का उदाहरण
उस दौर में शेयर बाजार में निवेश करना आज की तरह मोबाइल ऐप के जरिए आसान नहीं था। शेयर खरीदने और उनके स्वामित्व का प्रमाण रखने के लिए कागजी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता था। इसके बावजूद रिलायंस के सार्वजनिक निर्गम को मिला मजबूत समर्थन बताता है कि बड़ी संख्या में निवेशक किसी कंपनी के कारोबार में हिस्सेदारी लेने के इच्छुक थे।
रिलायंस अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर 1977 के IPO को भारत में इक्विटी निवेश की संस्कृति के विस्तार से जोड़ती है। कंपनी के इतिहास में इसे आम भारतीयों के लिए संपत्ति निर्माण के अवसर बढ़ाने वाली घटना के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि भारत में आम लोगों का शेयर बाजार में निवेश रिलायंस के IPO से ही शुरू हुआ। इसकी अहमियत इस बात में थी कि इसने व्यापक सार्वजनिक शेयरधारिता का एक उल्लेखनीय उदाहरण पेश किया।
2. कंपनी और निवेशकों के बीच सीधा संबंध
IPO के जरिए कंपनी अपने शेयर जनता को उपलब्ध कराती है। शेयर खरीदने वाले निवेशक कंपनी में हिस्सेदारी हासिल करते हैं और उनके निवेश का मूल्य कंपनी के प्रदर्शन तथा बाजार में शेयर की कीमत से प्रभावित होता है।
रिलायंस के सार्वजनिक निर्गम ने इस मॉडल को बड़े पैमाने पर सामने रखा। इससे कंपनी को विस्तार के लिए पूंजी जुटाने का रास्ता मिला और निवेशकों को एक औद्योगिक कंपनी की वृद्धि में हिस्सेदार बनने का अवसर मिला।
यहां एक अंतर समझना जरूरी है: 1977 का निर्गम मौजूदा शेयरधारकों की ओर से शेयरों की बिक्री था। इसलिए बिक्री से मिलने वाली राशि सीधे कंपनी को नए शेयर जारी करने के बदले मिलने वाली पूंजी के समान नहीं थी। कंपनी की वार्षिक रिपोर्ट इसे प्रवर्तक शेयरधारकों की ओर से की गई बिक्री बताती है।
3. छोटे शेयरधारकों का बड़ा आधार
रिलायंस की 1976-77 की वार्षिक रिपोर्ट में उस समय के शेयरधारकों से जुड़ी जानकारी दी गई है। कंपनी के रिकॉर्ड में 23 जनवरी 1978 तक सार्वजनिक निर्गम के आवंटन के बाद कुल 57,949 शेयरधारक दर्ज थे। इनमें सबसे बड़ा समूह 200 तक शेयर रखने वालों का था, जिनकी संख्या 56,129 बताई गई है।
ये आंकड़े बताते हैं कि कंपनी के शेयरों का स्वामित्व कुछ बड़े निवेशकों तक सीमित नहीं रहा। बड़ी संख्या में लोगों ने अपेक्षाकृत कम शेयरों के साथ भी कंपनी में हिस्सेदारी हासिल की।
यह व्यापक शेयरधारक आधार रिलायंस की आगे की कारोबारी यात्रा में महत्वपूर्ण रहा। हालांकि, इस आंकड़े को आज के पूरे भारतीय शेयर बाजार की तस्वीर नहीं माना जा सकता; यह एक कंपनी के शेयरधारकों का रिकॉर्ड है।
IPO के बाद रिलायंस का कारोबार कैसे आगे बढ़ा?
1977 के बाद रिलायंस ने अपने कारोबार का विस्तार किया। कंपनी के इतिहास के अनुसार, 1980-82 के दौरान उसने पातालगंगा में पेट्रोकेमिकल और पॉलिएस्टर फिलामेंट यार्न उत्पादन की सुविधाएं स्थापित कीं। वर्ष 1991 में हजीरा संयंत्र शुरू होने के साथ उसके औद्योगिक विस्तार को आगे बढ़ने का आधार मिला।
कंपनी ने बाद के वर्षों में इक्विटी और परिवर्तनीय डिबेंचर जैसे वित्तीय माध्यमों का इस्तेमाल करके भी पूंजी जुटाई। इससे उसके विस्तार के लिए सार्वजनिक पूंजी बाजार की भूमिका बनी रही।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि कंपनी की बाद की वृद्धि का पूरा श्रेय केवल 1977 के IPO को नहीं दिया जा सकता। औद्योगिक निवेश, कारोबारी रणनीति, बाजार की परिस्थितियां और बाद में जुटाई गई पूंजी भी उसकी यात्रा का हिस्सा थीं।
1977 और आज के IPO में क्या अंतर है?
1977 में शेयरों के आवेदन, आवंटन और स्वामित्व से जुड़ी प्रक्रियाएं मुख्य रूप से कागजी दस्तावेजों पर आधारित थीं। आज निवेशक डिजिटल माध्यमों से आवेदन कर सकते हैं और शेयर डीमैट खाते में रखे जाते हैं।
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) ने नवंबर 1996 में अपना परिचालन शुरू किया, जिससे भारतीय बाजार में इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रतिभूतियां रखने की व्यवस्था को बढ़ावा मिला।
आज IPO में आवेदन करने के लिए ASBA और UPI जैसी व्यवस्थाएं भी उपलब्ध हैं। इनसे आवेदन और भुगतान की प्रक्रिया पहले के मुकाबले अधिक सुविधाजनक हुई है। इस बदलाव के बावजूद मूल विचार वही है: कंपनियां पूंजी जुटाती हैं और निवेशक उनमें हिस्सेदारी हासिल करने के लिए आवेदन करते हैं।
रिलायंस के 1977 IPO की विरासत
रिलायंस टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज का 1977 का सार्वजनिक निर्गम भारतीय पूंजी बाजार के इतिहास में इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि इसे निवेशकों का व्यापक समर्थन मिला और कंपनी के शेयरधारकों का आधार हजारों लोगों तक पहुंचा।
इस घटना ने यह दिखाया कि सार्वजनिक शेयरधारिता किसी कंपनी की पूंजी जुटाने की व्यवस्था के साथ-साथ आम लोगों की कारोबारी हिस्सेदारी का माध्यम भी बन सकती है। भारतीय शेयर बाजार में निवेश की संस्कृति के विकास को समझने के लिए रिलायंस का यह शुरुआती IPO एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पड़ाव है।
संपादकीय सत्यापन नोट: IPO की तारीखों, शेयरों की संख्या, आवेदन अनुपात और सूचीबद्ध होने की तारीख के लिए रिलायंस की वार्षिक रिपोर्ट को प्राथमिक स्रोत माना गया है। कंपनी के शेयरधारकों के आधार पर दिए गए निष्कर्ष इसी कंपनी के रिकॉर्ड तक सीमित हैं; पूरे भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों की भागीदारी पर उनके प्रभाव को अलग से मात्रात्मक रूप से प्रमाणित नहीं किया गया है।