नई दिल्ली। विपक्षी INDIA ब्लॉक ने पिछले कुछ महीनों में नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ संसद से सड़क और अब सुप्रीम कोर्ट तक दबाव बनाने की कोशिश तेज की है। खास तौर पर चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने साझा अभियान चलाया है। अक्टूबर में विपक्षी नेताओं की कई संयुक्त गतिविधियों, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात और सुप्रीम कोर्ट में याचिका के बाद यह सवाल अहम हो गया है कि क्या INDIA ब्लॉक सरकार को राजनीतिक और संस्थागत स्तर पर वास्तविक दबाव में ला पाया है।
मौजूदा घटनाक्रम को देखें तो विपक्ष कुछ मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने में सफल रहा है, लेकिन इसे सरकार की नीतियों में निर्णायक बदलाव या किसी बड़े फैसले को पलटवाने की सफलता के रूप में अभी नहीं देखा जा सकता।
संसद में विपक्ष ने कितना दबाव बनाया?
2026 के मानसून सत्र में विपक्षी दलों ने कई मुद्दों पर सरकार के खिलाफ लगातार प्रदर्शन और सदन में विरोध किया। अगस्त में सत्र खत्म होने के बाद INDIA ब्लॉक के नेताओं ने दावा किया कि विपक्ष ने सरकार को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया और कुछ प्रमुख विधायी एजेंडे आगे नहीं बढ़ पाए। इनमें परिसीमन, महिला आरक्षण और FCRA में प्रस्तावित बदलाव जैसे मुद्दे शामिल बताए गए।
हालांकि, संसद में किसी विधेयक या सरकारी एजेंडे का रुकना हमेशा विपक्ष की स्थायी राजनीतिक जीत नहीं माना जा सकता। इसके लिए यह देखना होगा कि सरकार आगे इन मुद्दों को किस रूप में और कब वापस लाती है।
यानी संसद के स्तर पर विपक्ष ने व्यवधान और राजनीतिक बहस के जरिए दबाव जरूर बनाया, लेकिन इससे सरकार की समग्र राजनीतिक दिशा में अभी तक कोई निर्णायक बदलाव दिखाई नहीं देता।
SIR बना INDIA ब्लॉक का सबसे बड़ा साझा मुद्दा
अक्टूबर में विपक्ष ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपना अभियान तेज किया। INDIA ब्लॉक के नेताओं ने SIR को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग की।
1 अक्टूबर को विपक्षी दलों ने संयुक्त अभियान की घोषणा की थी। इसमें देशभर में विरोध कार्यक्रम, चुनाव आयोग तक मार्च और बाद में बड़ी रैली की योजना शामिल थी। विपक्ष ने बैलेट पेपर से मतदान की वापसी और SIR से पहले की मतदाता सूचियों को बहाल करने जैसी मांगें भी उठाईं।
6 अक्टूबर को राहुल गांधी समेत विपक्षी सांसदों ने चुनाव आयोग कार्यालय की ओर मार्च किया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया, हालांकि बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया।
इसके बाद 9 अक्टूबर को INDIA ब्लॉक के नेताओं ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे, SIR पर रोक, बैलेट पेपर से चुनाव और पिछले दो वर्षों में हुए विधानसभा चुनावों की समीक्षा जैसी मांगें रखीं।
सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मुद्दा
12 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं और समर्थकों ने दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया। इसके बाद INDIA ब्लॉक के नेताओं ने SIR से जुड़े मुद्दों को अदालत के सामने भी रखा। राहुल गांधी और 12 अन्य विपक्षी नेताओं की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की सूची बनी है।
यह विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अब उसका अभियान केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। चुनावी प्रक्रिया से जुड़े उसके आरोप और आपत्तियां न्यायिक जांच के दायरे में भी जा रही हैं।
हालांकि, यहां भी एक महत्वपूर्ण अंतर है। विपक्ष का राजनीतिक दावा और अदालत का निष्कर्ष एक चीज नहीं हैं। SIR की प्रक्रिया को लेकर आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष आने से पहले किसी भी आरोप को स्थापित तथ्य के रूप में नहीं लिखा जा सकता।
क्या विपक्षी एकता वास्तव में मजबूत हुई है?
यही INDIA ब्लॉक के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
एक तरफ कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और दूसरे विपक्षी दल कई मौकों पर साझा मंच पर दिखाई दिए हैं। दूसरी तरफ सीटों, राज्यों की राजनीति और अलग-अलग दलों के हितों को लेकर मतभेद भी सामने आते रहे हैं।
अक्टूबर में भी समाजवादी पार्टी के नेताओं की एक बैठक से अनुपस्थिति ने विपक्षी एकता को लेकर सवाल खड़े किए। इससे एक बात स्पष्ट होती है कि किसी एक मुद्दे पर साझा आंदोलन और स्थायी राजनीतिक गठबंधन में अंतर है।
तमिलनाडु में भी SIR के मुद्दे पर विपक्षी दलों की रणनीति पूरी तरह एक जैसी नहीं रही। DMK की स्थिति को लेकर रिपोर्टों में राजनीतिक दुविधा का उल्लेख हुआ है।
इसलिए INDIA ब्लॉक की ताकत केवल यह नहीं होगी कि कितने दल किसी एक प्रदर्शन में साथ आते हैं। असली परीक्षा यह होगी कि क्या ये दल संसद, राज्यों और चुनावी रणनीति में लंबे समय तक साझा लाइन कायम रख पाते हैं।
सरकार पर दबाव की सबसे बड़ी सीमा क्या है?
विपक्ष के अभियान का असर फिलहाल तीन स्तरों पर दिखाई देता है—राजनीतिक बहस, सार्वजनिक प्रदर्शन और न्यायिक प्रक्रिया।
लेकिन सरकार के स्तर पर किसी बड़े नीतिगत फैसले में बदलाव या चुनाव आयोग के नेतृत्व में विपक्ष की मांग के अनुरूप तत्काल परिवर्तन अभी सामने नहीं आया है।
इसके अलावा, विपक्ष की ओर से लगाए गए SIR संबंधी आरोपों को सरकार और चुनाव आयोग स्वीकार नहीं करते। चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची में बदलाव का उद्देश्य मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या अपात्र नामों को हटाना है। ऐसे में राजनीतिक आरोपों और आधिकारिक निष्कर्षों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
आगे की लड़ाई संसद से ज्यादा चुनावी मैदान में होगी
INDIA ब्लॉक के लिए अब सबसे अहम चुनौती अपने आंदोलन को केवल विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहने देना है।
अगर विपक्ष SIR, मतदाता सूची और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दों को अलग-अलग राज्यों में स्थानीय मुद्दों से जोड़ पाता है, तो उसका राजनीतिक प्रभाव बढ़ सकता है। इसके उलट, यदि अलग-अलग दल अपने-अपने राज्य हितों को प्राथमिकता देते हैं और संयुक्त रणनीति कमजोर पड़ती है, तो सरकार पर लगातार दबाव बनाए रखना मुश्किल होगा।
इस समय INDIA ब्लॉक ने यह जरूर दिखाया है कि वह साझा मुद्दे पर एक साथ सड़क पर उतर सकता है और सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय बहस खड़ी कर सकता है। लेकिन क्या वह इस दबाव को राजनीतिक या नीतिगत परिणाम में बदल पाएगा, इसका जवाब अभी बाकी है।
अगला महत्वपूर्ण संकेत सुप्रीम कोर्ट में SIR से जुड़ी याचिका की सुनवाई और आने वाले दिनों में विपक्ष की संयुक्त रणनीति से मिलेगा। इसके साथ यह भी देखना होगा कि INDIA ब्लॉक के घटक दल कितनी मजबूती से एक मंच पर बने रहते हैं।
फिलहाल तस्वीर यह है कि INDIA ब्लॉक मोदी सरकार पर दबाव बनाने में सक्रिय और दिखाई देने वाला विपक्षी मोर्चा जरूर बना है, लेकिन इसे निर्णायक राजनीतिक सफलता कहना अभी जल्दबाजी होगी।
नोट: SIR और मतदाता सूची को लेकर विपक्ष के आरोपों की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि अभी लंबित है। इसलिए लेख में आरोपों को आरोप/दावे के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है। राजनीतिक प्रभाव का आकलन उपलब्ध घटनाक्रम पर आधारित विश्लेषण है, इसे किसी भविष्यवाणी के रूप में नहीं लिखा गया है।