ई दिल्ली/संभल: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, 29 सितंबर 2026 को संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत निवारक हिरासत रद्द कर दी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया, जिसमें अफरोज की हिरासत को बरकरार रखा गया था। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत भी लगाई है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को किसी व्यक्ति को NSA के तहत निवारक हिरासत में रखने का आधार बनाया जा सकता है। अदालत ने कहा कि कथित कबूलनामा हिरासत का अकेला आधार नहीं हो सकता और हिरासत का आदेश पारित करते समय संबंधित परिस्थितियों और उचित सामग्री पर विचार किया जाना जरूरी है।
क्या था मामला?
यह मामला 24 नवंबर 2024 को संभल में शाही जामा मस्जिद के कोर्ट-आदेशित सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है। इस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी। मुल्ला अफरोज को पुलिस ने मामले में आरोपी बनाया था। रिपोर्टों के मुताबिक, घटना के करीब 54 दिन बाद उसकी गिरफ्तारी हुई थी।
अफरोज को बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट से जमानत मिली थी। इसके बाद संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने 13 अक्टूबर 2025 को NSA की धारा 3 के तहत उसके खिलाफ निवारक हिरासत का आदेश जारी किया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जून 2026 में इस हिरासत को चुनौती देने वाली उसकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
पुलिस हिरासत में कथित कबूलनामे पर कोर्ट ने उठाए सवाल
8 सितंबर को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कथित पुलिस हिरासत वाले कबूलनामे की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए थे। अदालत ने पूछा था कि क्या ऐसे बयान के आधार पर NSA के तहत निवारक हिरासत के लिए आवश्यक ‘subjective satisfaction’ बनाई जा सकती है। पीठ ने यह भी सवाल उठाया था कि घटना के करीब 54 दिन बाद गिरफ्तारी क्यों की गई और हिरासत के आदेश में CCTV फुटेज का उल्लेख क्यों नहीं किया गया।
उस समय उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि उपलब्ध सामग्री से यह आशंका बनती है कि अफरोज भविष्य में हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। राज्य ने हिरासत के समर्थन में उपलब्ध सामग्री और भविष्य में ऐसी गतिविधियों की संभावना का हवाला दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
29 सितंबर को फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा कि कथित कबूलनामा निवारक हिरासत का अकेला आधार नहीं हो सकता और संबंधित परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए। अदालत ने माना कि हिरासत आदेश पारित करते समय सक्षम प्राधिकारी ने उचित सामग्री पर पर्याप्त विचार नहीं किया।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने:
- मुल्ला अफरोज का NSA हिरासत आदेश रद्द किया।
- हिरासत की पुष्टि करने वाले आदेश को निरस्त किया।
- इलाहाबाद हाई कोर्ट के हिरासत बरकरार रखने वाले फैसले को रद्द किया।
- उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत लगाई।
मामले में अफरोज की ओर से यह भी दलील दी गई थी कि केवल कई आपराधिक मामलों की मौजूदगी अपने आप में निवारक हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं हो सकती। राज्य सरकार ने इसके विपरीत भविष्य में हिंसा और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की संभावना का तर्क दिया था।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट का 29 सितंबर का फैसला फिलहाल मुल्ला अफरोज की NSA के तहत निवारक हिरासत से संबंधित है। अदालत ने इस आधार पर हिरासत आदेश को रद्द किया है; इसे संभल हिंसा से जुड़े सभी आपराधिक आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की थी। केस Mulla Afroz v. Union of India & Ors., SLP (Crl.) No. 012534/2026 के रूप में दर्ज है।
सत्यापन नोट: 29 सितंबर 2026 के सुप्रीम कोर्ट के अंतिम आदेश का सार्वजनिक रूप से उपलब्ध पूर्ण पाठ इस खोज के दौरान नहीं मिला; इसलिए ऊपर फैसले से संबंधित वही बिंदु शामिल किए गए हैं जिनकी पुष्टि एक से अधिक ताजा न्यायिक-रिपोर्टिंग स्रोतों से हो सकी।