होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी संकट के बीच भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच समुद्र के रास्ते कच्चे तेल पहुंचाने वाली एक संभावित डीपवॉटर पाइपलाइन की व्यवहार्यता जांच शुरू की गई है। ब्रिटेन की इंजीनियरिंग कंपनी Peritus International ने 18 मई 2026 को बताया था कि उसे South Asia Gas Enterprises (SAGE) से यूएई से भारत तक डीपवॉटर ऑयल पाइपलाइन की व्यवहार्यता जांच का काम मिला है।
हालांकि, इसे भारत सरकार की ओर से मंजूर या निर्माणाधीन पाइपलाइन परियोजना बताना अभी सही नहीं होगा। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक फिलहाल इसका स्तर व्यवहार्यता अध्ययन का है। जून 2026 में भारत के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक अलग प्रस्तावित Middle East-India Deepwater Pipeline को लेकर स्पष्ट किया था कि मंत्रालय के स्तर पर उस समय ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं था।
क्या है भारत-यूएई समुद्री तेल पाइपलाइन का प्रस्ताव?
Peritus International के मुताबिक SAGE ने यूएई और भारत के बीच संभावित डीपवॉटर ऑयल पाइपलाइन की व्यवहार्यता जांच के लिए कंपनी को नियुक्त किया है। इसका उद्देश्य समुद्र के नीचे पाइपलाइन के जरिये कच्चे तेल की आपूर्ति की तकनीकी व्यवहार्यता को समझना है।
यह अध्ययन ऐसे समय में सामने आया है जब होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर सुरक्षा जोखिम बढ़े हैं। भारत के लिए यह मार्ग इसलिए अहम है क्योंकि पश्चिम एशिया से आने वाले कच्चे तेल के एक बड़े हिस्से की आपूर्ति इसी क्षेत्र से होकर होती है।
Peritus ने अपने बयान में कहा है कि अध्ययन में अत्यधिक गहरे समुद्री क्षेत्र में पाइपलाइन बिछाने, उसके संचालन और तकनीकी चुनौतियों का आकलन किया जाएगा।
भारत की कच्चे तेल पर आयात निर्भरता 88.7 फीसदी
भारत अपनी घरेलू जरूरतों के लिए कच्चे तेल के आयात पर काफी निर्भर है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में कच्चे तेल की आयात निर्भरता 88.7 फीसदी रही। यह आंकड़ा अस्थायी यानी provisional है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में यह निर्भरता लगातार ऊंची बनी हुई है:
- 2021-22: 85.5 फीसदी
- 2022-23: 87.4 फीसदी
- 2023-24: 87.8 फीसदी
- 2024-25: 88.3 फीसदी
- 2025-26: 88.7 फीसदी (अस्थायी आंकड़ा)
इसी अवधि में घरेलू कच्चे तेल उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई। वित्त वर्ष 2021-22 में उत्पादन 29.7 मिलियन टन था, जो 2025-26 में घटकर करीब 28 मिलियन टन रह गया।
होर्मुज संकट ने बढ़ाई वैकल्पिक रास्तों की जरूरत
होर्मुज जलडमरूमध्य पश्चिम एशिया से एशिया की ओर तेल आपूर्ति का प्रमुख समुद्री मार्ग है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार 2025 में करीब 15 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल इस जलडमरूमध्य से होकर गुजरा, जो वैश्विक कच्चे तेल व्यापार का लगभग 34 फीसदी था।
IEA के अनुसार इस मार्ग से गुजरने वाले तेल का बड़ा हिस्सा एशियाई देशों को जाता है। भारत और चीन मिलकर 2025 में होर्मुज से गुजरने वाले कच्चे तेल के निर्यात का करीब 44 फीसदी प्राप्त कर रहे थे।
मौजूदा संकट के कारण तेल कंपनियों और आयातकों ने वैकल्पिक मार्गों पर ध्यान बढ़ाया है। भारत के लिए यूएई का फुजैराह बंदरगाह पहले से ही एक महत्वपूर्ण विकल्प है, क्योंकि यह होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर अरब सागर की ओर स्थित है।
यूएई पहले से बना रहा है होर्मुज से बचने वाला पाइपलाइन नेटवर्क
भारत-यूएई डीपवॉटर पाइपलाइन प्रस्ताव को यूएई की अपनी ऊर्जा अवसंरचना योजनाओं से अलग करके देखना जरूरी है।
अबू धाबी ने West-East Pipeline परियोजना को तेज करने का फैसला किया है। ADNOC के मुताबिक यह पाइपलाइन अबू धाबी से फुजैराह तक कच्चे तेल की पहुंच बढ़ाएगी और होर्मुज जलडमरूमध्य को बाईपास करने में मदद करेगी। परियोजना के 2027 में परिचालन में आने की उम्मीद है।
मई 2026 में ADNOC ने बताया था कि नई West-East Pipeline से फुजैराह के रास्ते यूएई की तेल निर्यात क्षमता दोगुनी करने का लक्ष्य है।
इसका भारत-यूएई डीपवॉटर पाइपलाइन अध्ययन से सीधा समान होना अभी स्थापित नहीं है। एक परियोजना यूएई के भीतर कच्चे तेल को फुजैराह तक पहुंचाने से जुड़ी है, जबकि दूसरी भारत तक समुद्र के नीचे तेल पहुंचाने की संभावित व्यवस्था का अध्ययन है।
भारत के लिए फुजैराह क्यों अहम है?
होर्मुज जलडमरूमध्य के जोखिम बढ़ने के बाद भारतीय तेल आयातकों ने यूएई के फुजैराह और खोर फक्कान जैसे बंदरगाहों के इस्तेमाल पर भी ध्यान बढ़ाया है।
फुजैराह पहले से ही अंतरराष्ट्रीय तेल भंडारण और व्यापार का प्रमुख केंद्र है। यूएई की मौजूदा Habshan-Fujairah पाइपलाइन अबू धाबी के तेल क्षेत्रों से कच्चे तेल को फुजैराह तक पहुंचाती है, जिससे इसे होर्मुज के रास्ते से अलग निर्यात किया जा सकता है।
इस व्यवस्था के कारण भारत समेत एशियाई खरीदारों को पश्चिम एशियाई तेल की आपूर्ति के लिए एक वैकल्पिक समुद्री निकास मिलता है। हालांकि, इससे पूरे क्षेत्र की होर्मुज पर निर्भरता समाप्त नहीं होती।
डीपवॉटर पाइपलाइन के सामने बड़ी तकनीकी चुनौती
भारत और यूएई के बीच प्रस्तावित समुद्री पाइपलाइन अभी व्यवहार्यता अध्ययन के स्तर पर है। ऐसे में इसकी लंबाई, क्षमता, लागत और निर्माण की अंतिम समयसीमा को तय मानना जल्दबाजी होगी।
Peritus के मुताबिक इस तरह की पाइपलाइन के लिए समुद्र की अत्यधिक गहराई और समुद्र के नीचे की भौगोलिक परिस्थितियां प्रमुख तकनीकी चुनौतियां हैं। कंपनी पहले SAGE के Middle East-India Deepwater Pipeline यानी MEIDP गैस परियोजना से जुड़े तकनीकी अध्ययन पर काम कर चुकी है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर भी है। MEIDP मुख्य रूप से गैस पाइपलाइन की पुरानी अवधारणा है, जबकि मई 2026 में घोषित नया अध्ययन कच्चे तेल की डीपवॉटर पाइपलाइन की व्यवहार्यता से संबंधित है।
सरकार की स्थिति क्या है?
भारत सरकार के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 16 जून 2026 को मीडिया रिपोर्टों में चर्चा किए जा रहे Middle East-India Deepwater Pipeline को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया था। मंत्रालय ने कहा था कि गुजरात को ओमान और अन्य खाड़ी देशों से जोड़ने वाली बताई जा रही डीप-सी ऊर्जा पाइपलाइन उस समय मंत्रालय के स्तर पर विचाराधीन नहीं थी और ओमान या किसी अन्य खाड़ी देश के साथ इस परियोजना को लेकर सक्रिय बातचीत या वार्ता नहीं चल रही थी।
इसलिए मौजूदा भारत-यूएई तेल पाइपलाइन अध्ययन को सीधे भारत सरकार की स्वीकृत परियोजना कहना उपलब्ध आधिकारिक जानकारी से समर्थित नहीं है।
दूसरी ओर, Peritus का आधिकारिक बयान यह पुष्टि करता है कि SAGE ने यूएई-भारत डीपवॉटर ऑयल पाइपलाइन की व्यवहार्यता जांच का काम उसे दिया है।
आगे क्या होगा?
अगला महत्वपूर्ण चरण व्यवहार्यता अध्ययन के निष्कर्ष होंगे। इसमें तकनीकी रास्ते, समुद्र की गहराई, पाइपलाइन निर्माण की संभावनाएं, संचालन संबंधी जरूरतें और परियोजना की व्यावहारिकता जैसे पहलुओं का आकलन किया जाना है।
जब तक इस अध्ययन के आधार पर निवेश, निर्माण, क्षमता और समयसीमा को लेकर औपचारिक निर्णय सामने नहीं आता, तब तक इसे प्रस्तावित या अध्ययनाधीन परियोजना के रूप में ही देखना उचित है।
भारत के लिए इसका महत्व मुख्य रूप से ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक रास्ते तलाशने से जुड़ा है। फिलहाल देश की कच्चे तेल की करीब 88.7 फीसदी जरूरत आयात से पूरी होती है और होर्मुज जैसे प्रमुख समुद्री मार्ग में लंबे समय तक व्यवधान होने पर आपूर्ति तथा लागत पर असर पड़ सकता है।
इस बीच यूएई फुजैराह के जरिये होर्मुज से बाहर तेल निर्यात क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है। भारत-यूएई डीपवॉटर ऑयल पाइपलाइन का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि व्यवहार्यता अध्ययन तकनीकी और आर्थिक स्तर पर इसे कितना व्यावहारिक पाता है।
फैक्ट-चेक नोट: उपलब्ध स्रोतों के आधार पर “भारत-यूएई समुद्र में तेल पाइपलाइन बन रही है” कहना अभी अधिक मजबूत दावा होगा। सत्यापित स्थिति यह है कि यूएई-भारत डीपवॉटर ऑयल पाइपलाइन की व्यवहार्यता जांच के लिए अध्ययन दिया गया है; निर्माण की अंतिम मंजूरी या परियोजना की निश्चित समयसीमा की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिली।