मणिपुर में अक्टूबर की शुरुआत से हिंसा का एक नया दौर देखने को मिला है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर के पहले 10 दिनों में राज्य में संघर्ष से जुड़ी 14 मौतें दर्ज की गईं। इनमें सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य के पहाड़ी जिले रहे, जहां कुकी और नगा समुदायों के बीच हिंसा ने पहले से चले आ रहे तनाव को और बढ़ा दिया। इसके बाद 19 अक्टूबर को मैतेई समुदाय के तीन लोगों की हत्या और अन्य घटनाओं ने घाटी और पहाड़ी इलाकों में तनाव को फिर बढ़ा दिया।
सवाल यह है कि 2026 में अपेक्षाकृत शांत रहे कुछ इलाकों में अचानक हिंसा इतनी तेजी से क्यों बढ़ी? उपलब्ध घटनाक्रम और सुरक्षा विश्लेषण बताते हैं कि इसका एक ही कारण नहीं है। नगा-कुकी विवाद, बदले की कार्रवाई, गांवों में सक्रिय सशस्त्र समूह, पुराने जातीय तनाव और हथियारों की उपलब्धता ने मिलकर स्थिति को ज्यादा जटिल बनाया है।
अक्टूबर के पहले 10 दिनों में क्या हुआ?
Hub Network के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 4 से 11 अक्टूबर के बीच मणिपुर में संघर्ष से जुड़ी 14 मौतें दर्ज की गईं। इनमें 37 नगा और 36 कुकी-कुकी-जो मौतों सहित 2026 में 11 अक्टूबर तक कुल 84 संघर्ष-संबंधी मौतों का उल्लेख किया गया है। सितंबर में भी 23 मौतें दर्ज होने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
10 अक्टूबर को स्थिति खास तौर पर बिगड़ी। कामजोंग, कांगपोकपी और उखरुल जिलों में अलग-अलग घटनाओं में कम से कम नौ लोगों की मौत की रिपोर्ट सामने आई। करीब 14 घर भी जलाए गए। इन घटनाओं के बाद स्थानीय प्रशासन ने कुछ इलाकों में प्रतिबंध लगाए और सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई।
कामजोंग जिले के चस्साद गांव में एक कुकी महिला की गोली लगने से मौत के बाद सशस्त्र समूहों के बीच गोलीबारी बढ़ी। इसके बाद गांव और आसपास के इलाकों में हिंसा की कई घटनाएं सामने आईं। उखरुल और कांगपोकपी में भी हमले और घात लगाकर गोलीबारी की घटनाएं दर्ज हुईं। हालांकि अलग-अलग घटनाओं में हमलावरों को लेकर पक्षों के आरोप अलग रहे हैं और हर मामले में जिम्मेदारी की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
हिंसा का केंद्र अब सिर्फ मैतेई-कुकी विवाद नहीं
मणिपुर में मई 2023 से शुरू हुआ संघर्ष मुख्य रूप से मैतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच टकराव के रूप में सामने आया था। लेकिन 2026 में राज्य के पहाड़ी इलाकों में नगा और कुकी समुदायों के बीच संघर्ष ने अलग मोर्चा खोल दिया है।
ACLED के विश्लेषण के अनुसार, फरवरी 2026 से नगा और कुकी समुदायों के बीच हिंसा में करीब 50 नागरिकों की मौत दर्ज की गई है। संगठन के मुताबिक, इस संघर्ष के पीछे लंबे समय से चले आ रहे क्षेत्रीय विवाद और सामुदायिक तनाव हैं। गांवों में सक्रिय सशस्त्र स्वयंसेवी समूहों और अन्य हथियारबंद संगठनों की मौजूदगी ने भी हिंसा को बनाए रखने में भूमिका निभाई है।
यानी मौजूदा हिंसा को केवल 2023 के मैतेई-कुकी संघर्ष की अगली कड़ी मानना पर्याप्त नहीं होगा। राज्य के पहाड़ी जिलों में नगा-कुकी तनाव अब अपने अलग पैटर्न में फैल रहा है।
बदले की हिंसा ने स्थिति को और जटिल किया
मणिपुर में हाल की घटनाओं का एक प्रमुख पैटर्न यह है कि एक समुदाय के किसी व्यक्ति या गांव पर हमले के बाद दूसरे पक्ष की ओर से जवाबी कार्रवाई की आशंका बढ़ जाती है। इसके बाद गोलीबारी, घात लगाकर हमले, घरों में आगजनी और गांवों से लोगों के विस्थापन जैसी घटनाएं सामने आती हैं।
ACLED के अनुसार, फरवरी से नगा-कुकी संघर्ष में दर्ज घटनाओं में अपहरण, आगजनी और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी शामिल हैं। संगठन ने इस हिंसा को ऐसे चक्र से जोड़ा है जिसमें एक समुदाय के खिलाफ हुई कार्रवाई के बाद दूसरे पक्ष की ओर से प्रतिशोध का खतरा बढ़ता है।
यही वजह है कि किसी एक घटना को अलग-थलग देखने के बजाय लगातार हो रही घटनाओं की कड़ी के रूप में देखना जरूरी है।
हथियारबंद समूह और गांवों की सुरक्षा व्यवस्था
पहाड़ी इलाकों में स्थानीय स्तर पर गांवों की सुरक्षा के लिए हथियारबंद स्वयंसेवी समूहों की मौजूदगी भी चुनौती बढ़ा रही है। ACLED ने कहा है कि ऐसे समूहों के साथ-साथ नगा और कुकी हितों से जुड़े स्थापित उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों ने हिंसा को बनाए रखने में योगदान दिया है।
इसका असर यह है कि किसी इलाके में तनाव बढ़ने पर सुरक्षा बलों के लिए केवल मुख्य सड़क या बाजार की सुरक्षा पर्याप्त नहीं रहती। गांवों और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों तक सुरक्षा पहुंचाना भी जरूरी हो जाता है।
19 अक्टूबर की घटना इसका एक अलग उदाहरण है। पुलिस के अनुसार, लकड़ी काटने और ले जाने गए मैतेई ग्रामीणों पर हथियारबंद लोगों ने गोलीबारी की, जिसमें तीन लोगों की मौत हुई और अन्य घायल हुए। मैतेई संगठनों ने हमले के लिए कुकी पक्ष से जुड़े हथियारबंद लोगों को जिम्मेदार बताया, जबकि कुकी संगठनों ने आरोप से इनकार किया। इस मामले में जांच जारी है।
सरकार और सुरक्षा बलों की क्या तैयारी है?
मणिपुर पुलिस ने 21 अक्टूबर को बताया कि DGP मुकेश सिंह ने कामजोंग जिले का दौरा किया और असम राइफल्स तथा BSF के अधिकारियों के साथ सुरक्षा समन्वय बैठक की। पुलिस के मुताबिक, बैठक में जिले की कानून-व्यवस्था और सुरक्षा स्थिति की समीक्षा की गई। DGP ने नगा और कुकी नागरिक संगठनों के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की और शांति तथा सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए पुलिस की ओर से सहयोग का भरोसा दिया।
इससे पहले 10 अक्टूबर की हिंसा के बाद भी प्रशासन ने प्रभावित इलाकों में प्रतिबंध लगाए थे। सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ाने और संवेदनशील इलाकों में निगरानी मजबूत करने की कोशिश की गई।
क्या 14 मौतों का आंकड़ा मौजूदा कुल मौतों को बताता है?
नहीं। 14 मौतों का आंकड़ा अक्टूबर के पहले 10 दिनों से संबंधित है। इसके बाद भी मणिपुर में हिंसा की कई घटनाएं हुई हैं। इसलिए इसे पूरे अक्टूबर या 24 अक्टूबर तक की कुल मौतों की संख्या नहीं माना जाना चाहिए।
19 अक्टूबर को कम से कम तीन मैतेई लोगों की हत्या की खबर आई। इसके बाद भी अलग-अलग जिलों में गोलीबारी, आगजनी और विरोध-प्रदर्शन की घटनाएं सामने आती रहीं। 23 अक्टूबर तक तनाव के कारण बंद और विरोध की स्थिति भी बनी हुई थी।
आगे सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
मौजूदा घटनाक्रम बताता है कि मणिपुर की सुरक्षा चुनौती अब कई स्तरों पर फैल चुकी है। एक तरफ मैतेई-कुकी संघर्ष का पुराना अविश्वास मौजूद है, तो दूसरी तरफ पहाड़ी जिलों में नगा-कुकी हिंसा ने नया तनाव पैदा किया है। इसके अलावा गांवों में हथियारबंद समूहों की मौजूदगी और बदले की कार्रवाई का खतरा किसी स्थानीय घटना को तेजी से बड़े संघर्ष में बदल सकता है।
इसलिए केवल अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती से स्थायी समाधान निकलना मुश्किल है। सुरक्षा व्यवस्था के साथ प्रभावित समुदायों के बीच बातचीत, हथियारबंद समूहों पर नियंत्रण और स्थानीय स्तर पर भरोसा बहाल करना भी जरूरी होगा। फिलहाल कामजोंग, कांगपोकपी, उखरुल और दूसरे संवेदनशील पहाड़ी जिलों में सुरक्षा स्थिति पर नजर बनी हुई है।
Verification Note: “10 दिनों में 14 मौतें” का आंकड़ा 11 अक्टूबर तक उपलब्ध रिपोर्टेड आंकड़ों पर आधारित है। इसे 24 अक्टूबर तक की कुल मौतों का आंकड़ा नहीं माना गया है। अलग-अलग घटनाओं में मृतकों और जिम्मेदार पक्षों की संख्या को लेकर रिपोर्टों में अंतर है; इसलिए जहां आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं थी, वहां आरोपों को आरोप के रूप में ही रखा गया है।