दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 का चार महीने का सीजन खत्म हो गया है। भारत में जून से सितंबर के बीच कुल 759.4 मिलीमीटर बारिश हुई, जो लंबी अवधि के औसत यानी एलपीए की 87% है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के मुताबिक यह 2001 के बाद चौथी सबसे कम मानसूनी बारिश रही। देश के अलग-अलग हिस्सों में बारिश का वितरण भी एक जैसा नहीं रहा। कुछ इलाकों में सामान्य या उससे ज्यादा बारिश हुई, जबकि कई क्षेत्रों में लगातार कमी दर्ज की गई।
आईएमडी की 30 सितंबर की अंतिम मानसून रिपोर्ट के अनुसार, 36 मौसम विज्ञान उपखंडों में 18 में सामान्य बारिश हुई। 17 उपखंडों में बारिश सामान्य से कम रही, जबकि केवल ओडिशा वाले उपखंड में अधिक बारिश दर्ज की गई। क्षेत्रफल के हिसाब से 42% हिस्सा कम बारिश वाले उपखंडों में आता है।
जून में सबसे ज्यादा कमी, जुलाई में कुछ राहत
इस साल मानसून की शुरुआत कमजोर रही। जून में देश में सामान्य के मुकाबले सिर्फ 65% बारिश हुई। जुलाई में स्थिति सुधरी और बारिश 101% एलपीए तक पहुंची। लेकिन अगस्त में फिर कमी आई और बारिश 84% एलपीए रही। सितंबर में 92% एलपीए बारिश दर्ज की गई।
आईएमडी के आंकड़ों के मुताबिक जून में देश में 106.8 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य बारिश 165.3 मिमी रहती है। जुलाई में 283.3 मिमी, अगस्त में 213.3 मिमी और सितंबर में 155.1 मिमी बारिश दर्ज की गई।
मानसून के दौरान बारिश का उतार-चढ़ाव भी काफी ज्यादा रहा। जुलाई के मध्य में एक सप्ताह में मौसमी बारिश की कमी 51.1% तक पहुंच गई थी। बाद में जुलाई के आखिरी हिस्से और अगस्त की शुरुआत में बारिश बढ़ी, लेकिन अगस्त और सितंबर में फिर कमी बनी रही। सितंबर के अंतिम सप्ताह में बारिश की एक तेज गतिविधि ने कुछ हद तक स्थिति सुधारी।
पूर्वी और दक्षिणी भारत में ज्यादा असर
पूरे देश के आंकड़े के पीछे क्षेत्रीय तस्वीर काफी अलग है। आईएमडी के मुताबिक उत्तर-पश्चिम भारत में मानसूनी बारिश एलपीए की 94% रही, जबकि मध्य भारत में यह 97% रही। इसके उलट पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में बारिश केवल 74% और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में 76% रही।
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 2026 की मानसूनी बारिश 1,016.3 मिमी रही, जो इस क्षेत्र के एलपीए 1,367.3 मिमी से काफी कम है। दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में 542 मिमी बारिश हुई, जो एलपीए का 76% है। आईएमडी ने इसे 1901 के बाद के रिकॉर्ड में इस क्षेत्र की चौथी सबसे कम और 2001 के बाद दूसरी सबसे कम मानसूनी बारिश बताया है।
महाराष्ट्र में बारिश की कमी और सूखे का दबाव
महाराष्ट्र में राज्य का औसत आंकड़ा भी क्षेत्रीय अंतर को पूरी तरह नहीं दिखाता। राज्य में मराठवाड़ा और विदर्भ के कई हिस्सों में बारिश की कमी ज्यादा रही, जबकि पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में भारी बारिश हुई।
महाराष्ट्र सरकार ने 26 सितंबर को राज्य की 358 तहसीलों में से 265 में सूखा घोषित किया था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह फैसला सूखा प्रबंधन संहिता के तहत लिया गया। मराठवाड़ा के आठ जिलों में भी बारिश की कमी दर्ज की गई है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र में इस साल मानसूनी बारिश का कुल घाटा करीब 18% रहा। मराठवाड़ा में यह कमी लगभग 38% और विदर्भ में 27% बताई गई। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में इसके उलट अधिक बारिश हुई।
इस असमान बारिश का सीधा असर खेती पर पड़ सकता है। मराठवाड़ा में खरीफ फसलों के बाद रबी की बुवाई को लेकर भी चिंता सामने आई है। मिट्टी में नमी कम होने और उपलब्ध जल संसाधनों पर दबाव बढ़ने से चना और ज्वार जैसी फसलों की बुवाई प्रभावित होने की आशंका रिपोर्टों में जताई गई है।
एक ही मानसून में कहीं कमी, कहीं बहुत ज्यादा बारिश
2026 के मानसून की एक बड़ी विशेषता बारिश का असमान वितरण रहा। आईएमडी के अनुसार 741 मौसम विज्ञान जिलों में 282 जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज हुई। 34 जिलों में बारिश सामान्य से काफी कम रही। दूसरी ओर 90 जिलों में सामान्य से अधिक और 16 जिलों में सामान्य से काफी ज्यादा बारिश दर्ज की गई।
इसका मतलब यह है कि केवल देश या राज्य के औसत आंकड़े से पानी और खेती की वास्तविक स्थिति का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। एक ही राज्य के अलग-अलग जिलों में बारिश की तस्वीर काफी अलग हो सकती है।
मध्य भारत इसका उदाहरण है। पूरे मानसून सीजन में इस क्षेत्र में बारिश एलपीए की 97% रही और इसे सामान्य श्रेणी में रखा गया। लेकिन जून में मध्य भारत में बारिश एलपीए की केवल 50% थी। जुलाई में लगातार बारिश से स्थिति सुधरी और उस महीने क्षेत्र को एलपीए की 133% बारिश मिली।
पानी और खेती पर आगे क्या असर हो सकता है?
मानसून की कमी का असर केवल बारिश के आंकड़े तक सीमित नहीं रहता। जिन क्षेत्रों में बारिश कम रही है, वहां मिट्टी की नमी, जलाशयों, भूजल और सिंचाई की उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है। खासकर वर्षा आधारित खेती वाले इलाकों में इसका असर अगली फसल की बुवाई पर पड़ सकता है।
महाराष्ट्र में सामने आई स्थिति बताती है कि मानसून खत्म होने के बाद भी पानी और खेती से जुड़ी चुनौती खत्म नहीं होती। मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में कम बारिश के साथ जलाशयों और भूजल पर दबाव रबी सीजन की योजना को प्रभावित कर सकता है।
देश के स्तर पर भी पूर्वी, पूर्वोत्तर और दक्षिणी हिस्सों में सामान्य से कम बारिश का असर स्थानीय जल संसाधनों और कृषि पर अलग-अलग रूप में सामने आ सकता है। हालांकि इन प्रभावों की वास्तविक गंभीरता राज्य और जिले के अनुसार अलग होगी।
मानसून की विदाई के बाद भी बारिश का दौर संभव
आईएमडी के अनुसार 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून 19 सितंबर को पश्चिमी राजस्थान से लौटना शुरू हुआ था। 30 सितंबर तक वापसी की प्रक्रिया जारी थी। मानसून की वापसी के साथ पूरे देश में बारिश तुरंत खत्म नहीं होती। स्थानीय मौसम प्रणालियों के कारण अक्टूबर की शुरुआत में भी कई इलाकों में बारिश हो सकती है।
आईएमडी ने 30 सितंबर को अक्टूबर 2026 के लिए मौसमी पूर्वानुमान भी जारी किया है। इसलिए मानसून सीजन के औसत आंकड़े सामने आने के बावजूद आने वाले दिनों की स्थानीय बारिश को अलग से देखा जाना जरूरी होगा।
51% सूखे वाले दावे पर क्या स्थिति है?
इस खबर के संदर्भ में 51% भारत के सूखे से प्रभावित होने का आंकड़ा कुछ रिपोर्टों और विश्लेषणों में इस्तेमाल किया गया है। हालांकि आईएमडी की 30 सितंबर की आधिकारिक मानसून रिपोर्ट में इस रूप में “भारत का 51% क्षेत्र सूखा” आंकड़ा नहीं दिया गया है। आईएमडी के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि 42% क्षेत्र वाले 17 मौसम विज्ञान उपखंडों में मानसूनी बारिश सामान्य से कम रही, जबकि जिला स्तर पर 38% क्षेत्र में सामान्य से कम और 5% क्षेत्र में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज हुई।
इसी वजह से 51% के आंकड़े को इस रिपोर्ट में प्रमाणित राष्ट्रीय सूखा आंकड़े के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर फिलहाल स्पष्ट तस्वीर यह है कि 2026 का मानसून देश में सामान्य से कम रहा और बारिश का वितरण बेहद असमान रहा।
नोट: दिए गए मूल शीर्षक में मौजूद “51% भारत सूखा” और “20 साल की सबसे ज्यादा बारिश” जैसे दावों की स्वतंत्र, आधिकारिक पुष्टि नहीं मिली। इसलिए इन्हें सत्यापित तथ्य के रूप में लेख में शामिल नहीं किया गया है।