नई दिल्ली में 12 अक्टूबर 2026 को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में INDIA गठबंधन के नेताओं और समर्थकों ने बाराखंबा रोड से सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया। इस प्रदर्शन का केंद्र चुनाव आयोग की मतदाता सूची की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया, कथित मतदाता नाम कटौती और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की आपत्तियां रहीं। मार्च के साथ ही विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में एक संयुक्त याचिका भी दाखिल की।
यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि विपक्ष ने चुनाव आयोग से जुड़े विवाद को संसद और सड़क के विरोध से आगे बढ़ाकर न्यायिक प्रक्रिया के सामने रखा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने याचिका में कई प्रक्रियात्मक कमियां बताई हैं और 13 अक्टूबर तक याचिका सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हो सकी थी।
क्यों निकाला गया सुप्रीम कोर्ट तक मार्च?
राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेताओं का मुख्य मुद्दा SIR के दौरान मतदाता सूची में बदलाव है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने का खतरा है और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता की जरूरत है।
विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की भी मांग की है। राहुल गांधी ने इससे पहले 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च का ऐलान करते हुए SIR रोकने और कथित ‘वोट चोरी’ के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ‘वोट चोरी’ और मतदाता नामों में कथित अनियमितता विपक्ष के राजनीतिक आरोप हैं। इन्हें न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
CJI से मिलने की कोशिश और फिर याचिका का रास्ता
मार्च से पहले राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत से मुलाकात का समय मांगा था। CJI ने यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया।
संबंधित रिपोर्टों के मुताबिक, CJI ने कहा कि जिन मुद्दों को लेकर ज्ञापन दिया जाना था, वे न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में आते हैं। ऐसे मामलों पर प्रशासनिक स्तर पर बैठक करने के बजाय अदालत में याचिका दाखिल करना उचित रास्ता है। उन्होंने न्यायिक अधिकारों के इस्तेमाल के लिए अदालत का रुख करने की बात कही।
इसके बाद विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया और याचिका दाखिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।
याचिका में क्या मांग की गई है?
INDIA गठबंधन की ओर से दाखिल याचिका में SIR से जुड़े मतदाता नामों के बदलाव और चुनाव आयोग के फैसलों की न्यायिक जांच की मांग की गई है।
याचिका में प्रमुख रूप से:
- SIR के दौरान हटाए गए और बदले गए मतदाता रिकॉर्ड का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग।
- इस प्रक्रिया की जांच के लिए सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति बनाने का अनुरोध।
- मतदाताओं के नाम बिना उचित प्रक्रिया और सूचना के हटाए जाने से सुरक्षा की मांग।
- चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और संबंधित रिकॉर्ड की जांच की मांग।
- SIR प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने का अनुरोध।
याचिका में चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने क्या कहा?
मार्च के बाद दाखिल याचिका को लेकर 13 अक्टूबर को एक नया कानूनी पेच सामने आया। सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने याचिका में 14 प्रक्रियात्मक कमियां बताईं।
रिपोर्टों के अनुसार, इनमें कुछ जरूरी दस्तावेजों और पन्नों की कमी या अस्पष्टता, नौ याचिकाकर्ताओं से संबंधित आवश्यक प्राधिकरण दस्तावेजों की कमी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पहचान पत्र की अस्पष्ट प्रति और करीब 220 रुपये की कोर्ट फीस की कमी शामिल है।
इस वजह से याचिका 13 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हो सकी। पहले इन प्रक्रियात्मक आपत्तियों को दूर करना होगा, जिसके बाद मामले के सूचीबद्ध होने का रास्ता साफ हो सकता है।
राजनीति के लिए इसका क्या मतलब है?
राहुल गांधी के इस मार्च को केवल एक विरोध प्रदर्शन के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। इसके तीन राजनीतिक पहलू स्पष्ट दिखाई देते हैं।
पहला, चुनावी प्रक्रिया को राजनीतिक मुद्दा बनाना।
विपक्ष SIR और मतदाता सूची में बदलाव को आगामी चुनावों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़कर उठा रहा है। इससे चुनाव आयोग की भूमिका राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है।
दूसरा, विपक्षी दलों को एक मंच पर लाना।
मार्च में कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, वाम दलों और अन्य विपक्षी दलों के नेताओं की भागीदारी सामने आई। इससे विपक्ष को एक साझा मुद्दे पर साथ दिखाने की कोशिश भी स्पष्ट है।
तीसरा, राजनीतिक आंदोलन से न्यायिक चुनौती तक जाना।
संसद में विरोध, सड़क पर प्रदर्शन और अब सुप्रीम कोर्ट में याचिका—विपक्ष ने एक ही मुद्दे को अलग-अलग संस्थागत मंचों पर उठाने की रणनीति अपनाई है। लेकिन अदालत में राजनीतिक आरोपों से अलग, याचिका में लगाए गए दावों को कानूनी और दस्तावेजी आधार पर साबित करना होगा।
BJP का क्या कहना है?
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी के मार्च और विरोध प्रदर्शन की आलोचना की है। BJP की ओर से इसे राजनीतिक प्रदर्शन और संस्थाओं पर दबाव बनाने की कोशिश बताया गया है। पार्टी ने राहुल गांधी के कदम को राजनीतिक नाटक बताया है।
दूसरी ओर, कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का कहना है कि उनका आंदोलन मतदाता अधिकारों, चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ा है। इस तरह दोनों पक्ष इस घटनाक्रम को अलग-अलग राजनीतिक नजरिए से देख रहे हैं।
अब आगे क्या?
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका की प्रक्रियात्मक स्थिति है। रजिस्ट्री की ओर से बताई गई कमियों को दूर किए जाने के बाद याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि सुप्रीम कोर्ट SIR पर रोक लगाएगा या चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष की मांगों को स्वीकार करेगा। अदालत के सामने मामला आने के बाद आगे का रुख न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर तय होगा।
राहुल गांधी का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि चुनाव आयोग और मतदाता सूची को लेकर चल रहा राजनीतिक विवाद अब सीधे न्यायिक मंच तक पहुंच चुका है। लेकिन राजनीतिक आंदोलन की सफलता और अदालत में कानूनी राहत—दोनों अलग-अलग कसौटियां हैं। अगले चरण में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विपक्ष अपनी याचिका की प्रक्रियात्मक कमियां दूर करने के बाद अदालत के सामने अपने दावों को किस तरह रखता है।