गुजरात के सूरत में वड़ा पाव बेचने वाले अनिलभाई की कहानी इन दिनों सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्टों में चर्चा में है। अनिलभाई ने 1997 में सिर्फ ₹2.50 में वड़ा पाव बेचने से अपना कारोबार शुरू किया था। इससे पहले उन्होंने ONGC में करीब 17 महीने तक चपरासी के तौर पर काम किया था। नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने अपनी मां के साथ मिलकर वड़ा पाव का काम शुरू किया।
करीब तीन दशक बाद भी अनिल भाई ने अपना पुराना काम नहीं छोड़ा है। उनका वड़ा पाव का ठेला उनके घर के पास ही लगा रहता है और उनके मुताबिक वह आज भी जरूरत पड़ने पर खुद ठेला निकालते हैं। उनके ठेले के ठीक बगल में एक बड़ा सफेद बंगला है, जिसे उन्होंने खरीदा है।
ONGC में चपरासी की नौकरी की थी
टाइम्स ऑफ इंडिया की 14 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, अनिलभाई ने बताया कि वड़ा पाव का कारोबार शुरू करने से पहले वह परिवार के साथ अलग-अलग काम करते थे। परिवार जूते-चप्पलों की देखभाल, पार्किंग और सब्जियां बेचने जैसे काम भी करता था।
इसके बाद उन्होंने अपनी मां के साथ ONGC में काम किया। अनिलभाई के अनुसार, उन्होंने वहां करीब 17 महीने तक चपरासी के रूप में काम किया। इसके बाद नौकरी छोड़कर वड़ा पाव बेचने का फैसला किया।
1997 में ₹2.50 का मिलता था वड़ा पाव
अनिलभाई ने बताया कि उनकी मां को वड़ा पाव बनाना आता था। परिवार ने मुंबई के लोकप्रिय स्ट्रीट फूड से प्रेरणा लेकर सूरत में इसे बेचने की शुरुआत की।
शुरुआत में एक वड़ा पाव की कीमत ₹2.50 रखी गई थी। अनिलभाई के मुताबिक, उनकी मां वड़ा पाव तैयार करती थीं और वह उसे ग्राहकों तक पहुंचाने और बेचने का काम करते थे।
समय के साथ उनका कारोबार उसी इलाके में चलता रहा। शुरुआती ठेला मुख्य सड़क पर लगाया जाता था, लेकिन बाद में उसे मौजूदा जगह पर ले आया गया। अनिलभाई ने बताया कि पुराने स्थान पर विवाद होने के बाद ठेले को दूसरी जगह ले जाना पड़ा था।
मां के मसाले को बताते हैं खास
जब उनसे पूछा गया कि उनके वड़ा पाव की खासियत क्या है, तो अनिलभाई ने इसका श्रेय अपनी मां को दिया। उनके मुताबिक, मसाला उनकी मां तैयार करती हैं और परिवार मिलकर उसे बेचता है। परिवार के दूसरे सदस्य भी लंबे समय तक इस काम से जुड़े रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, अनिलभाई के भाई ने भी वड़ा पाव की दुकान चलाई है। उनके दामाद भी कारोबार में उनके साथ काम करते हैं।
बंगले के बाहर आज भी ठेला
इस कहानी का सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला हिस्सा उनका बंगला और उसके बाहर लगा वड़ा पाव का ठेला है। अनिलभाई का कहना है कि उन्होंने खुद को बंगला बनाने वाला नहीं माना और इसके पीछे माता जी का आशीर्वाद बताया। उन्होंने यह भी कहा कि वह आज भी जरूरत पड़ने पर खुद ठेला निकालते हैं।
उन्होंने बताया कि वह सुबह करीब 6 बजे ठेला निकालते हैं। अगर कोई कर्मचारी उपलब्ध नहीं होता, तो वह खुद काम संभालते हैं। बंगले के परिसर में ग्राहकों के खड़े होकर वड़ा पाव खाने के लिए जगह भी बनाई गई है।
₹40 करोड़ के बंगले का दावा कितना सही है?
सोशल मीडिया पर अनिल भाई के बंगले की कीमत करीब ₹40 करोड़ बताई जा रही है। हालांकि, उपलब्ध विश्वसनीय रिपोर्ट में इस संपत्ति की स्वतंत्र रूप से पुष्टि की गई कीमत सामने नहीं आती। सोशल मीडिया पोस्टों में भी ₹40 करोड़ के आंकड़े को रिपोर्टों पर आधारित बताया गया है, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इस आंकड़े को अनिल भाई की सत्यापित संपत्ति या नेटवर्थ के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
उपलब्ध रिपोर्टों से इतना स्पष्ट है कि अनिलभाई ने 1997 में ₹2.50 के वड़ा पाव से शुरुआत की थी और करीब तीन दशक बाद भी उसी कारोबार से जुड़े हुए हैं। उनका ठेला उनके घर के पास आज भी दिखाई देता है।